मंगलवार, 27 जनवरी 2026

भाषाई चुनौतियाँ और समाधान

                                           

                                                  भाषाई चुनौतियाँ और समाधान 


भाषा मानव जीवन का महत्वपूर्ण अंग है। यह संचार, शिक्षा, व्यापार और संस्कृति के प्रसार का माध्यम है। हालांकि, विविध भाषाओं और बोलियों के कारण विभिन्न भाषाई चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं। इन चुनौतियों का समाधान ढूंढना एक महत्वपूर्ण कदम है, जिससे व्यक्तियों और समाज के बीच प्रभावी संचार स्थापित किया जा सके।

         भारत जैसे विशाल देश की भाषाई विविधता भी अपनी एक अलग पहचान बनाती है, जहाँ 22 से ज़्यादा आधिकारिक भाषाएँ प्रयोग में लाई जाती हैं। भारत भाषाई विविधता में भी एकता को संजोए हुए है जो इस देश की संस्कृति, राजनीति और स्वस्थ समाज को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भारत की भाषाई विविधता वास्तव में उल्लेखनीय है, जैसा कि हम सब जानते हैं कि देश भर में सैकड़ों भाषाएँ एवं बोलियाँ बोली जाती हैं। इनमें से केवल कुछ भाषाओं को ही भारत सरकार द्वारा आधिकारिक भाषाओं के रूप में मान्यता प्राप्त हैं। भारत के संविधान के अनुसार, हिंदी, अंग्रेज़ी, बंगाली, तेलुगु, मराठी, तमिल, गुजराती, उर्दू और पंजाबी सहित 22 आधिकारिक भाषाएँ हैं।

सार : हिंदी भारत में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है, 41% से अधिक आबादी इसे अपनी पहली भाषा के रूप में बोलती है। हालाँकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि हिंदी भाषा में भी महत्वपूर्ण भिन्नताएँ हैं, देश के विभिन्न क्षेत्रों में इसकी अलग-अलग बोलियाँ बोली जाती हैं। उदाहरण के लिए, दिल्ली में बोली जाने वाली हिंदी मुंबई या चेन्नई में बोली जाने वाली हिंदी से भिन्न है। हिंदी के अलावा, कई अन्य क्षेत्रीय भाषाएँ भी हैं जो देश भर में व्यापक रूप से बोली जाती हैं। उदाहरण के लिए, बंगाली भारत में दूसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है, 8% से अधिक आबादी इसे अपनी पहली भाषा के रूप में बोलती है। इसी तरह, तेलुगु, तमिल, मराठी और गुजराती आदि सभी भाषाओं का अपना अस्तित्व है |

शब्द कुंजिका : विविधता, भिन्नताएँ, सामाजिक, महत्वपूर्ण, व्यापक, चुनौतियाँ, जटिलता आदि।   

विषय विस्तार : हम सभी लोग इस बात से भली-भांति अवगत हैं कि भारत विविधताओं का देश है, न केवल भौगोलिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से बल्कि भाषाओं में भी। 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में 22 अनुसूचित भाषाएँ और 1,600 से भी अधिक अन्य भाषाएँ और बोलियाँ बोली जाती हैं। इस भाषाई विविधता के अपने फायदे हैं, लेकिन यह कई चुनौतियाँ भी पेश करती है। अत: हम कह सकते हैं कि भारत की भाषाई विविधता के फायदे और चुनौतियाँ दोनों हैं। एक ओर, यह भारतीय संस्कृति की समृद्धि और जटिलता का प्रमाण है, इसने एक विविध और जीवंत समाज के विकास में योगदान दिया है। तो दूसरी ओर, यह संचार और एकता में बाधाएँ भी पैदा करती है। क्योंकि विभिन्न क्षेत्रों और भाषाई पृष्ठभूमि के लोग एक-दूसरे को समझने के लिए अनेक चुनौतियों का सामना करते हैं। इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए, भारत सरकार ने भाषाई सद्भाव और समझ को बढ़ावा देने के लिए कई नीतियों को लागू किया है। उदाहरण के तौर पर हम देखें तो क्षेत्रीय भाषाओं के अध्ययन और विकास को बढ़ावा देने के लिए भाषा अकादमियों की स्थापना की गई है। इसी तरह से स्कूलों में द्विभाषी शिक्षा के उपयोग को प्रोत्साहित किया जाता है।

(I) चुनौतियाँ : भारत में भाषाई विविधता की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक आम भाषा का अभाव है। हालाँकि हिंदी संघ की आधिकारिक भाषा है, लेकिन कई राज्यों की अपनी आधिकारिक भी भाषाएँ हैं, जिससे अलग-अलग राज्यों के लोगों के बीच संचार बाधाएँ पैदा होती हैं। लोगों को एक-दूसरे से संवाद करने में संघर्ष करते देखना असामान्य नहीं है, क्योंकि वे अलग-अलग भाषाएँ बोलते हैं। एक और समस्या क्षेत्रीय भाषाओं में शिक्षा की कमी भी है। कई राज्यों में, शिक्षा का प्राथमिक माध्यम अंग्रेजी है, जो अधिकांश छात्रों की मातृभाषा नहीं है। इसका परिणाम यह होता है कि अक्सर छात्रों को अवधारणाओं को समझने में संघर्ष करना पड़ता है और वे अपनी पढ़ाई में पिछड़ जाते हैं। यह उन लोगों के लिए शिक्षा तक पहुँचने में भी बाधा है जो अंग्रेजी में धाराप्रवाह नहीं हैं।

     भाषाई विविधता में एक और समस्या हिंदी और अंग्रेजी जैसी प्रमुख भाषाओं के अलावा अन्य भाषाओं में शिक्षा की कमी भी है। भारत के अधिकांश स्कूल हिंदी या अंग्रेजी में पढ़ाते हैं, जिससे बच्चों के लिए अपनी मूल भाषा सीखना और उसे बनाए रखना मुश्किल हो जाता है। इसका परिणाम यह है कि कई भारतीय भाषाएँ खत्म हो रही हैं क्योंकि युवा पीढ़ी उनमें धाराप्रवाह संवाद करने में असमर्थ है। भाषाई विविधता आर्थिक क्षेत्र में भी एक महत्वपूर्ण समस्या है। भारत की विशालता को ध्यान में रखते हुए यदि हम देखें तो पाते हैं कि अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग भाषाएँ बोली जाती हैं, जिससे व्यवसायों के लिए पूरे देश में प्रभावी ढंग से संवाद करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। संचार की इस कमी से गलतफहमी, देरी और यहाँ तक कि लोगों को व्यापार में नुकसान भी उठाना पड़ता है। भाषाई विविधता भारत के राजनीतिक परिदृश्य को भी प्रभावित करती है। देश भर में इतनी सारी भाषाएँ बोली जाने के कारण, राजनेताओं के लिए लोगों से प्रभावी ढंग से संवाद करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इससे अक्सर राजनेता विशिष्ट भाषाई समुदायों को आकर्षित करने के लिए विभाजनकारी बयानबाजी पर निर्भर हो जाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप एक खंडित राजनीतिक परिदृश्य बनता है और यही कारण है कि अंतत: भाषाई विविधता ही सामाजिक असमानता को भी जन्म दे सकती है। जो लोग हिंदी या अंग्रेजी नहीं बोलते हैं, उन्हें अक्सर शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में हाशिए पर रखा जाता है और उनके साथ भेदभाव किया जाता है। उन्हें नौकरी पाने, शिक्षा प्राप्त करने और यहाँ तक कि बुनियादी सेवाओं तक पहुँचने में  भी संघर्ष करना पड़ता है, जिससे अमीर और गरीब के बीच की खाई और चौड़ी हो जाती है।

     यदि हम ध्यान से देखें तो जहाँ एक तरफ़ भारत की भाषाई विविधता देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और इतिहास को दर्शाती है तो वहीँ दूसरी तरफ संचार और एकता के मामले में चुनौतियाँ पैदा करती है। हाँलाकि अब समय बदल रहा है और भाषाएँ सीखने पर यह लोगों को विकास और समझ के कई अवसर भी प्रदान करती हैं लेकिन ऐसा हो पाना सामान्य जन के लिए आज भी थोड़ा मुश्किल ही है।

भाषाई चुनौतियाँ: हम इन भाषाई चुनौतियों को निम्नलिखित बिन्दुओं से व्यक्त कर सकते हैं :-

1.  भाषाओं का लुप्त होना: दुनिया में हजारों भाषाएँ हैं, लेकिन इनमें से कई भाषाएँ विलुप्ति के कगार पर हैं। जब कोई भाषा समाप्त हो जाती है, तो उसके साथ उसकी संस्कृति, इतिहास और ज्ञान भी खत्म हो जाता है।

2.  भाषा के बीच अंतर: विभिन्न क्षेत्रों और देशों में भाषा और लहजे में भिन्नताएँ होती हैं। जब दो व्यक्ति अलग-अलग भाषाएँ बोलते हैं, तो उनके बीच संचार में कठिनाई होती है। यह समस्या खासकर शिक्षा, व्यापार और राजनैतिक संवाद में देखी जा सकती है।

3.  तकनीकी भाषा : तकनीकी और वैज्ञानिक ज्ञान का अधिकतर लेखन अंग्रेजी में होता है। जो लोग अंग्रेजी नहीं जानते, उन्हें इस ज्ञान तक पहुँचने में कठिनाई होती है।

4.  भाषाई पूर्वाग्रह: कई बार भाषाओं के आधार पर भेदभाव होता है। कुछ भाषाओं को 'प्रमुख' और 'आधुनिक' माना जाता है, जबकि अन्य भाषाओं को 'क्षेत्रीय' और 'अप्रासंगिक' समझा जाता है। इससे भाषाई समानता को आघात पहुँचता है।

5.  शासन और प्रशासन में चुनौतियाँ : अलग-अलग भाषाई पृष्ठभूमि के लोगों की ज़रूरतों को पूरा करना सरकार या प्रशासन के लिए बहुत ही चुनौतीपूर्ण बन जाता है। आधिकारिक दस्तावेज़ों का अलग-अलग भाषाओं में अनुवाद करना भी महँगा और समय लेने वाला काम है। इन चुनौतियों के समाधान के लिए, हिन्दी और अंग्रेज़ी जैसी व्यापक रूप से बोली जाने वाली भाषाओं को बढ़ावा देना चाहिए।

6.  भाषा शिक्षण में चुनौतियाँ : किसी भी भाषा को सीखना आसान नहीं होता, खासकर तब, जब सीखने वाली भाषा वह मातृभाषा से अलग होती है। भाषाई शिक्षण में कई चुनौतियाँ देखने को मिलती हैं हैं, जैसे कि पढ़ने वाले में अरुचि का होना, उच्चारण की समस्याएँ, अच्छे शिक्षकों की कमी, मातृभाषा का प्रभाव, और व्याकरण का कठिन होना, इसके साथ ही साथ अभ्यास की कमी आदि। इन चुनौतियों से निपटने के लिए, भाषा सीखने में रूचि को पैदा करना तथा भाषा सिखाने के लिए नए-नए तरीकों का प्रयोग करना एवं ‘मनसा-वाचा-कर्मणा’ शिक्षक कार्य करने वाले शिक्षकों की नियुक्ति करना ज़रूरी है । 

    भाषाविज्ञान में चुनौतियाँ : भाषाविज्ञान में, बड़े डेटासेट का विश्लेषण करना अधिक चुनौतीपूर्ण होता है। वाक्यों का विश्लेषण करना, ध्वन्यात्मक पैटर्न का अध्ययन करना, या भाषा भिन्नता की जाँच करना, इन सभी में बड़ी मात्रा में डेटा को संभालना कठिन हो जाता है ।

8.  मानकीकरण की कमी : भारत में भाषाई विविधता के कारण सबसे महत्वपूर्ण समस्याओं में से एक देश में बोली जाने वाली विभिन्न भाषाओं के मानकीकरण की कमी है। देश की विशालता के कारण, क्षेत्रों के भीतर भी भाषा की बोलियाँ अलग-अलग हैं, जिससे प्रत्येक भाषा का मानकीकृत संस्करण बनाना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

समाधान : इन समस्याओं के समाधान की और दृष्ठि डालें तो कई समाधान के मार्ग दिखाई देते हैं उनमे से कुछ इस प्रकार से है :-

1.  भाषाओं का संरक्षण और संवर्धन: विलुप्त होती भाषाओं के संरक्षण के लिए सरकारों और सामाजिक संगठनों को मिलकर काम करना चाहिए। इसमें डिजिटल दस्तावेज़ीकरण, भाषा पाठ्यक्रमों का निर्माण और भाषाई साहित्य को संरक्षित करना शामिल है।

2.  बहुभाषी शिक्षा प्रणाली: प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में दी जानी चाहिए। साथ ही, छात्रों को एक या दो अतिरिक्त भाषाओं का ज्ञान दिया जाना चाहिए। इससे बच्चे अपनी जड़ों से जुड़े रहेंगे और वैश्विक संचार में भी सक्षम होंगे।

3.  अनुवाद तकनीकों का विकास: आधुनिक तकनीक, जैसे कि ऑटोमैटिक अनुवाद उपकरण, संचार को सरल और प्रभावी बनाने में मदद कर सकते हैं। AI और मशीन लर्निंग आधारित अनुवाद सेवाएँ भाषाई अंतर को कम करने में सहायक हैं।

4.  भाषाई विविधता का सम्मान: भाषाओं के प्रति समानता और सम्मान का प्रचार किया जाना चाहिए। सरकारी और निजी संस्थानों को अपनी कार्यप्रणाली में बहुभाषी नीति अपनानी चाहिए ताकि सभी नागरिकों को समान अवसर मिले।

5.  तकनीकी सामग्री का अनुवाद: वैज्ञानिक और तकनीकी लेखों का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद होना चाहिए ताकि अधिक से अधिक लोग इस ज्ञान तक पहुँच सकें। इसके लिए वैश्विक संगठनों और शैक्षणिक संस्थानों को अनुवादकों की सहायता लेनी चाहिए।

इन सब के अलावा महत्वपूर्ण समाधान यह भी हो सकता है कि एक ऐसी आम भाषा को बढ़ावा दें जो पूरे देश में व्यापक रूप से बोली जाती हो और यदि हम देखे तो पाते हैं कि हिंदी भारत में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है और उसके साथ ही अंग्रेजी भी व्यापक रूप से बोली और समझी जाती है। इन दो भाषाओं को एक आम भाषा के रूप में बढ़ावा देने से संचार अंतराल को पाटने और भाषा-आधारित भेदभाव को कम करने में मदद मिल सकती है।

         एक अन्य समाधान के रूप में क्षेत्रीय भाषाओं में शिक्षा को बढ़ावा देना है। इससे न केवल छात्रों को अवधारणाओं को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलेगी बल्कि क्षेत्रीय भाषाओं और संस्कृतियों को भी संरक्षित किया जा सकेगा। प्रौद्योगिकी का उपयोग कर क्षेत्रीय भाषाओं में ऑनलाइन संसाधन प्रदान करके शिक्षा में भी सहायता की जा सकती है तथा गैर-अंग्रेजी बोलने वालों को भाषा में अपनी दक्षता सुधारने में मदद करने हेतु भाषा प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किए जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त, कंपनियों को बहुभाषी कर्मचारियों को नियुक्त करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है ।

निष्कर्ष : भारत की भाषाई विविधता एक आकर्षक और जटिल विषय है। भाषाई विविधता भारत की सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक है, लेकिन यह देश के सम्मुख महत्वपूर्ण चुनौतियाँ भी पेश करती है। भाषाओं का मानकीकरण, गैर-प्रमुख भाषाओं में शिक्षा, प्रभावी संचार, राजनीतिक एकता और सामाजिक समानता ऐसे महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं, जिन पर देश के सामने आने वाली भाषाई विविधता की समस्याओं को दूर करने के लिए ध्यान देने की आवश्यकता है। एक आम भाषा निर्धारित कर तथा क्षेत्रीय भाषाओं में शिक्षा को बढ़ावा देकर इन चुनौतियों को कम किया जा सकता है, जिससे एक अधिक समावेशी और समृद्ध भारत का निर्माण हो सकता है।

      अंत में हम कह सकते हैं कि, भाषाई चुनौतियाँ एक जटिल समस्या हैं, लेकिन आधुनिक तकनीक और सामाजिक जागरूकता के माध्यम से इनका समाधान संभव है। यदि हम सभी भाषाओं को समान महत्व दें और संचार के लिए अधिक समावेशी दृष्टिकोण अपनाएँ, तो समाज में समरसता और ज्ञान का प्रसार बेहतर तरीके से हो सकेगा।

 संदर्भ ग्रंथ सूची :

1.     रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव : भाषा-शिक्षण, वाणी प्रकाशन, 1992

2.     महिपाल सिंह और देवेन्द्र मिश्र : विश्व बाज़ार में हिंदी, ब्रह्म प्रकाशन, 2010

3.     शम्भुनाथ तिवारी : शोध और समीक्षा के विविध आयाम, शोध परिषद्, हिंदी विभाग 2013

4.     उमाकांत गुप्त और ब्रजरतन जोशी : अनुसंधान स्वरूप और आयाम, वाणी प्रकाशन, 2016

5.     विश्व हिंदी पत्रिका 2016, विश्व हिंदी सचिवालय, मॉरीशस

6.     प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का वक्तव्य : दैनिक समाचार-पत्र अमर उजाला’, 6 सितम्बर, 2022

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

सरला बिरला अकादमी: शिक्षा, संस्कार और सपनों का संगम

सरला बिरला अकादमी: शिक्षासंस्कार और सपनों का संगम

बेंगलुरु स्थित सरला बिरला अकादमी (एस.बी.ए.केवल एक आवासीय विद्यालय ही नहींबल्कि वह संसार है जहाँ शिक्षा संस्कारों से जुड़ती है और सपने दिशा पाते हैं। यह विद्यालय भारत के अग्रणी औद्योगिक समूह आदित्य बिरला समूह की उन मूल भावनाओं और व्यावहारिक मूल्यों की सजीव अभिव्यक्ति हैजिनकी नींव मानवीय मूल्यईमानदारीनैतिकतासहयोगप्रतिबद्धता और निरंतर प्रगति पर रखी गई है। कक्षा 5 से 12वीं तक संचालित यह प्रतिष्ठित बॉयज़ रेज़िडेंशियल स्कूल ICSE, ISC, IGCSE एवं IB जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर के पाठ्यक्रमों के माध्यम से विद्यार्थियों को वैश्विक शिक्षा से जोड़ता है। किंतु यहाँ शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रहती—यह जीवन को समझने और जीने की कला सिखाती है।

     आज के समय में जब प्रतिस्पर्धा और तकनीक शिक्षा का केंद्र बन गई हैसरला बिरला अकादमी मानवीय मूल्यों को शिक्षा का आधार बनाती है। ईमानदारीनिष्ठापारदर्शिता और विश्वास जैसे मूल्य यहाँ दैनिक जीवन का हिस्सा हैं। विद्यालय का विश्वास है कि सशक्त व्यक्तित्व का निर्माण केवल अकादमिक उत्कृष्टता से नहींबल्कि चरित्र निर्माण से होता है।

      एस.बी.ए. की आत्मा में प्राचीन गुरुकुल परंपरा की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। यहाँ शिक्षक केवल ज्ञानदाता नहींबल्कि मार्गदर्शक और अभिभावक की भूमिका निभाते हैं। छात्र-शिक्षक संबंध औपचारिक दायरे से आगे बढ़कर स्नेहविश्वास और आत्मीयता का रूप ले लेते हैं। आधुनिक पाश्चात्य प्रभावों के बीच यह विद्यालय भारतीय संस्कृति और मूल्यों को आत्मसात करते हुए विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास को सुनिश्चित करता है।

      यहाँ विद्यार्थी केवल परीक्षा की तैयारी नहीं करतेबल्कि स्वतंत्र रूप से सोचनेकल्पना करने और नवाचार के नए आयाम खोजने के लिए प्रेरित होते हैं। एस.बी.ए. उन्हें नए रास्ते गढ़ने और भविष्य की चुनौतियों का सामना आत्मविश्वास के साथ करने का अवसर प्रदान करता है—और यही इसे विशिष्ट बनाता है।

       नैतिक एवं चारित्रिक मूल्यों के साथ-साथ विद्यार्थियों को सामाजिक और वैश्विक जिम्मेदारियों के लिए भी तैयार किया जाता है। KISA, ROUND SQUARE, IPSC, TAISI, IAYP, IIMUN एवं IFSPD जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं और मंचों से जुड़कर विद्यार्थी खेल, समग्र विकास, सेवासाहसिक गतिविधियोंकौशल विकास और शारीरिक सशक्तिकरण का अनुभव प्राप्त करते हैं। ये अनुभव उन्हें नेतृत्वसतत विकास और वैश्विक नागरिकता की ओर अग्रसर करते हैं।

      दो दशकों से अधिक की समर्पित शैक्षिक यात्रा में सरला बिरला अकादमी ने अपने मूल्यों पर आधारित दृष्टिकोण से उल्लेखनीय पहचान बनाई है। इसी का परिणाम है कि विद्यालय को वर्ष 2023 में “स्कूल ऑफ द ईयर” तथा 2025 में देश के “प्रथम बॉयज़ आवासीय विद्यालय” का गौरव पूर्ण सम्मान प्राप्त हुआ है।

       एस.बी.ए. में शिक्षा का अर्थ समाज से जुड़ना भी है। “प्रोजेक्ट अक्षयकल्प” जैसी पहल के माध्यम से विद्यार्थी पर्यावरण संरक्षणसतत विज्ञान और पारंपरिक कृषि ज्ञान के महत्व को समझते हैं। विद्यालय के छात्र समाज में गरीब और असहाय बच्चों को शिक्षित करनेपर्यावरण की साफ़-सफ़ाई करके उसे स्वच्छ रखने और सामाजिक उत्तरदायित्व निभाने के माध्यम से संवेदनशील और जागरूक नागरिक बनते हैं।

      रचनात्मकता तो यहाँ विद्यार्थियों की पहचान है। एस.बी.ए. के स्टूडियो और मंचों पर बात-विवाद प्रतियोगिताओं में आत्मविश्वास पनपता है तो कहीं रचनात्मकता के पायदान पर कहानियाँ जन्म लेती हैंसंगीत रचा जाता है और कल्पनाएँ रंगों में ढलती हैं। यही वह स्थान है जहाँ सपने केवल देखे नहीं जातेबल्कि उन्हें साकार करने का साहस भी सिखाया जाता है।

     सरला बिरला अकादमी वास्तव में वह भूमि है जहाँ शिक्षासंस्कार और सृजनशीलता मिलकर भविष्य के नेतृत्वकर्ताओं का निर्माण करती है।

                                                          डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 

  

सोमवार, 29 दिसंबर 2025

21वीं सदी के उपन्यासों में चित्रित राजनीति के कारण उत्पन्न विघटन

 

21वीं सदी के उपन्यासों में चित्रित राजनीति के कारण उत्पन्न विघटन

 

प्रस्तावना : वर्तमान युग राजनीति से प्रभावित युग है। समाज एवं जीवन के सभी क्षेत्र राजनीति और नेताओं से अछूते नहीं हैं। यह बड़ी अजीब बात है कि लोगों के सोच और उनके कर्म में कितना अंतर होता है। वहीँ यह बात भी सर्वमान्य है कि कर्म सोच का ही परिमार्जित रूप होता है। फिर इस दोहरे मानदंड का अर्थ क्या है? ऐसी कौन सी अवस्थाएं हैं जो लोगों को उनके उद्देश्य से भटका देतीं हैं, अंतरात्मा की आवाज़ को दबा देतीं हैं? इस बात को स्पष्ट करने के लिए मानव जीवन का एक सूक्ष्म विश्लेषण आवश्यक है। अब तक यह बात सर्वमान्य रही है की एक शक्ति है जो सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड को नियंत्रित एवम् संचालित करती है। उसे चाहे ईश्वर नाम दें या प्रकृति। यही बात पृथ्वी और इसपर उपस्थित सभी जीवधारियों पर भी लागू होती है। यद्यपि कि हमारे अन्वेषण का केंद्र बिंदु मानव जीवन और उसकी प्रवृत्ति है तथापि एक नियम या प्रवृत्ति समस्त जीवधारियों में सामान है और वह है अपने अस्तित्व को बनाए रखने की प्रवृत्ति। मनुष्य पृथ्वी पर उपस्थित सभी प्राणियों में श्रेष्ठ है और इस श्रेष्ठता का मूल है प्रकृति प्रदत्त मानव मस्तिष्क की शक्ति, उसकी कल्पनाशीलता दूरदर्शिता, विचारशीलता, आकलन संवेदना आदि। इन्ही गुणों के बल पर मानव ने अन्य जीवों पर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध किया है। लेकिन अगर प्रकृति ने मनुष्य को इन विशेष गुणों से परिपूर्ण बनाया है तो इसके पीछे अवश्य ही कोई निश्चित उद्द्येश्य होगा।

   ग्रामीणों का राजनीति करण हमारे देश में सदा से ही होता चला आया है लेकिन आजकल जो कुछ किसानों को लेकर संसद से सड़क तक देखने को मिला रहा है वह किसी से छिपा हुआ नहीं हैं |        

शब्द कुंजिका : राजनीति, आधुनिकीकरण, औधोगिकीकरण, किसान-शोषण, बाज़ारवाद, सरकारी नीतियाँ |

शोध विधि : यह शोध-पत्र पूर्णतया नवीनता से युक्त विभिन्न स्रोतों तथा अधिकारिक वेबसाइट पर आधारित है | इस शोध-प्रपत्र में हिंदी उपन्यासों में निहित राजनीति के कारण उत्पन्न विघटन को आधुनिक विकासमय वातावरण में जीवन और समस्यओं को समेलित एवं चिन्हित कर उन्हें प्रकाश में लाने का एक प्रयास किया गया है |

शोध-विस्तार : राजनीति का अर्थ राज्य की नीति से है- वह नीति जिसके अनुसार राजा अपने राज्य का शासन तथा प्रजा की रक्षा करता है। जनता के सुरक्षा की आवश्यकता के लिए एक शासन तंत्र की आवश्यकता होती है। यह शासन तंत्र राजनीति के अन्तर्गत ही आता है।

        राजनीति बहुत पुराने समय से मनुष्य जीवन का एक अभिन्न अंग रही है जिसे मानव जीवन में अपनी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के कारण प्रत्येक काल के मानव ने स्वयं से जुड़ा हुआ पाया है, मनुष्य पर इसका प्रभाव लगातार बढ़ता ही जा रहा है। राजनीति विभिन्न स्तरों पर समाज को तथा हर व्यक्ति के जीवन को किसी न किसी रूप में प्रभावित करती  ही रहती है। समाज में यदि किसी नई चेतना का प्रकट होती है तो इसमें राजनीतिक का प्रभाव अवश्य ही देखा जा सकता है। राजनीति का समाज पर इतना ज्यादा असर होता है कि मानव का व्यवहार इससे आजाद या अलग नहीं रह पाता।

 इसी तरफ ध्यान दिलाते हुए रोम्यां रोला जी लिखते हैं, जो कोई मानव-समाज के लिए युद्ध चाहता है, उसे राजनीतिक क्षेत्र में युद्ध करना चाहिए, पर अपने मस्तिष्क की स्वाधीनता को किसी भी हालत में नहीं छोड़ना चाहिए। क्योंकि मानसिक स्वाधीनता ही उसे युद्ध क्षेत्र में हावी बनाए रखेगी

        बीसवीं सदी के अंतिम दशक का राजनीतिक परिवेश अस्थिरता एवं भ्रष्टाचार की दृष्टि से सबसे ज्यादा प्रभावित रहा है। इक्कीसवीं सदी की आरंभ में वाजपेयी जी प्रधानमंत्री थे। देश की विकास गति बढ़ा देने में उनका योगदान है। अनेक दलों की मिली-जुली सरकार को वाजपेयी जी ने बड़े अच्छे ढंग से चलाया। इसके बाद भारतीय राजनीति में प्रांतीय एवं प्रादेशिक पक्ष की संख्या लगातार बढ़ती गई।

        मानक हिन्दी कोश में राजनीति के दो अर्थों को अभिव्यक्त किया गया है- "एक वह नीति या पद्धति विशेष जिसके अनुसार किसी राज्य का प्रशासन किया जाता है या होता है। दूसरी गुटों, वर्गों आंदि की पारस्परिक स्पर्धावाली स्वार्थ पूर्ण नीति।" इससे स्पष्ट होता है कि एक सुरक्षा की प्रवृत्ति के अन्तर्गत बनाई जाने वाली आदेशात्मक नीति होती है और दूसरी अंहकार के कारण सत्ता के नशे में चूर विकृत राजनीति होती है, जो शोषण का रूप धारण कर लेती है। इसका उत्तम उदहारण ‘अकाल में उत्सव’ उपन्यास में देखेने को मिलता है “हर छोटा किसान किसी न किसी का कर्जदार है, बैंक का सोसाइटी का, बिजली विभाग का या सरकार का।”

       गुटबाजी और षड्यंत्रों का अर्थ राजनीति नहीं होता। राजनीति के नाम पर इस प्रकार की भ्रष्ट व्यवस्था के प्रति विद्रोह और आक्रोश की नीति संभव है। स्वस्थ राजनीति शोषितों की पक्षघर होती है ताकि अन्याय और असमानता का विरोध किया जा सके और जनता को उसके अधिकारों के प्रति जागृत होने की दिशा दी जा सके।"

       इक्कीसवीं सदी में प्रवेश की राजनीति चेतना भ्रष्ट राजनीति का पूरी तरह से विरोध करती है उसके प्रति विरोध और विद्रोह के प्रखर स्वरों को मुखर करती हुई कुछ भी कर गुजने के बिलकुल तैयार ही दिखाई देती है। आम लोग जो राजनीति से सीधे तौर पर प्रभावित होते है। वे भी उन नेताओं के कारण दलों में विभाजित हो जाते है क्योंकि राजनीति ही उनका आश्रय और शरणस्थली बन चुकी है। ऐसा करने पर ही नेता कुछ भीं कर सकते हैं। शोषितों के प्रति सहानूभूति को उनकी मर्म-चेतना पूरी तरह से बतलाती है। नेताओं को पूरे दिल से राजनीति करनी चाहिए। यही उनका पेशा है, और इसके लिए निष्ठावान रहना उनका कर्तव्य है। इस कथन का कारण आज के नेताओं की राजनीति और नैतिकता को सामान्यतः हानिकारक और स्वार्थपरक माना जाता है। लेकिन राजनीतिक वर्ग में राजनीति के साथ वैधता को लेकर बड़ा द्वंद चलता रहता है। ऐसा माना जाता है कि एक नेता को पूरे मन से राजनीति को अपना कर्तव्य मानकर करना चाहिए। लेकिन जहाँ नैतिकता और राजनीतिक दांवपेंचों के बीच भेद करने का अवसर आता है, वहाँ समस्या खड़ी हो जाती है। क्या इसका अर्थ यह समझा जाए कि राजनीति में नैतिकता की कोई गुंजाइश नहीं है? सिर्फ जीत ही मायने रखते है वह होनी चाहिए चाहे जैसे जीत के बाद नेताओं का छिपा स्वार्थ निकलकर सामने आता है जिसके कई उदहारण हमें हिंदी उपन्यासों में देखने को मिल जाते हैं |

        देश के प्रशासनिक अधिकारियों की अंग्रेजी मानसिकता अंग्रेजों के देश छोड़ के चले जाने के 70 वर्ष बाद भी किस प्रकार से सिस्टम का अंग बना हुआ है और वह सिस्टम यहाँ के गरीब, किसान और निम्न वर्ग के लोगों का दिन-रात शोषण कर रहा है। “कलेक्टर नाम के इस प्राणी को अंग्रेजों ने बहुत फुर्सत में बनाया था। सारी कूटनीति घोलकर डाल दी थी उसमें।” यहाँ पर यदि हम देखें तो पाते हैं कि गरीब, कमजोर या असहाय का शोषण करने में कोई भी पीछे नहीं है चाहे राजनेता हो या फिर सरकारी अधिकारी बस कमी है तो अवसर की मौका पाते ही सब का असली चेहरा सामने आ जाता है। "राजनीतिक उपन्यासों के स्वतन्त्र अस्तित्व को मानने से आलोचक तथा इतिहासकार हिचकते रहे हैं। जिसके फलस्वरूप राजनीतिक उपन्यास की परिभाषा अभी तक निर्धारित नहीं हो सकी है। साहित्यकार तथा आलोचकों ने राजनीतिक उपन्यासों को कभी समाजवादी उपन्यास के रूप में देखा तो समय सरगम उपन्यास में कृष्णा सोबती जी ने आरक्षण की राजनीति रूपी तबे पर नेताओं की सिकती रोटी को समाज के सम्मुख उजागर करने के प्रयास से जिसमें एक संदर्भ में संवैधानिक आरक्षण के प्रति हेय नजरिए की अभिव्यक्ति हुई, और इस आरक्षण के विरुद्ध शिकायत मानो किसी संसार नियंता प्रभु तक पहुंचाई जा रही है, यह मान कर कि धरती पर के प्रभुवर्ग इस आरक्षण को हटाने से रहे। वे लिखती है कि- “स्वर्ग की सभी निधियां आपने मृत्युलोक की ओर प्रवाहित कर दी हैं। क्या आप हमें अनुसूचित जातियों का-सा आरक्षण कार्ड दे रहे हैं? प्रभुवर, ऐसा न कीजिए। हमें क्या आपकी संसद के बाहर धरना देना पड़ेगा!”

             निष्कर्ष : आज यदि हम समाज में देखें तो हर वर्ग आम जनता का ही फायदा उठाना चाहता है | गाँव की राजनीति से लेकर देश कि राजनीति तक हर जगह ही आम जनता को मोहरा बनाया जाता है यदि मैं ऐसा कहूँ तो कुछ गलत नहीं होगा | आम जनता का राजनीति करण हमारे देश में सदा से ही होता चला आया है लेकिन आजकल जो कुछ किसानों को लेकर संसद से सड़क तक देखने को मिला रहा है वह किसी से छिपा हुआ नहीं हैं | लोकतांत्रिक व्यवस्था की विसंगतियों तथा नेताओं की अदूरदर्शिता एवं भ्रष्टाचार की भरपाई, गरीब जनता को करनी पडती है। पुलिस और नेताओं की मिली भगत, सरकारी अफसरों की चाटुकारिता और सत्ता पक्ष में रहने वाले वर्ग का गरीब जनता के प्रति उदासीनता के भाव ने समाज की दशा और दिशा को प्रभावित किया है। जनता में असुरक्षा की भावना के कारण उनके जीवन में संघर्ष और नीरसता का भाव भर देता है। राजनीति का आधार देश में व्यवस्था को मजबूत करना    है । सत्ताधारी वर्ग बहुमत की राजनीति द्वारा शक्ति को प्राप्त करता है । शासन पक्ष-विपक्ष में बँटकर नैतिकता को भूल जाता है। आज की राजनीति में खलनायक ही राजनायक बन सकते है ।

 संदर्भ ग्रंथ :-

1.   पंकज सुबीर, अकाल में उत्सव, पृष्ठ संख्या – 11

2.   समय सरगरम, कृष्णा सोबती, पृष्ठ संख्या -112

3.   डॉ. संजीव, अमृतलाल नागर के उपन्यासों में युग चेतना, पृष्ठ संख्या – 91



                                                                                    

भाषाई चुनौतियाँ और समाधान

                                                                                              भाषाई चुनौतियाँ और समाधान   भाषा मानव जीवन का ...