शनिवार, 5 सितंबर 2026

रिश्तों का अदृश्य श्रम: जो दिखाई नहीं देता

                रिश्तों का अदृश्य श्रम: जो दिखाई नहीं देता

किसी भी रिश्ते को बाहर से देखिए, वह अक्सर दो लोगों की कहानी दिखाई देता है। दो चेहरे, दो मुस्कानें, दो ज़िंदगियाँ। लेकिन थोड़ा भीतर उतरकर देखिए, तो समझ आएगा कि किसी भी रिश्ते में केवल दो लोग नहीं रहते। वहाँ अनगिनत छोटी-छोटी जिम्मेदारियाँ रहती हैं, अनकहे एहसास रहते हैं, अधूरे वाक्य रहते हैं, और वह मौन रहता है जो हर दिन प्रेम को टूटने से बचाता है।

रिश्ते केवल बड़े वादों से नहीं चलते। वे उन छोटी बातों पर टिके रहते हैं जिन्हें अक्सर कोई देखता भी नहीं।

घर की मेज़ पर रखा पानी सबको दिखाई देता है, लेकिन हर बार खाली बोतल भरकर रखने वाला हाथ याद नहीं रहता। त्योहार पर सजा हुआ घर सबको अच्छा लगता है, लेकिन कई रातों की अधूरी नींद, मन की भागदौड़ और तैयारी में लगी थकान किसी की स्मृति का हिस्सा नहीं बनती। परिवार की सामूहिक हँसी सुनाई देती है, लेकिन उस हँसी को बचाने के लिए कितनी बार किसी ने अपने आँसू भीतर ही रोक लिए, इसका कोई हिसाब कहीं दर्ज नहीं होता। 

यही रिश्तों का सबसे गहरा और सबसे खामोश सच है—जो सबसे अधिक प्रेम करता है, वह अक्सर सबसे अधिक अदृश्य श्रम भी करता है।

भावनाओं का भार भी एक श्रम है

हम अक्सर श्रम को केवल शरीर की मेहनत से जोड़ते हैं। लेकिन मन भी थकता है, और कई बार शरीर से कहीं अधिक थकता है।

दूसरों की नाराज़गी को पहले से महसूस कर लेना, किसी के चेहरे की चुप्पी पढ़ लेना, टूटती बातचीत को फिर जोड़ देना, घर में किस बात से किसे चोट लग सकती है यह लगातार सोचते रहना—ये सब भी काम हैं। बस इन पर पसीना दिखाई नहीं देता।

किसी बच्चे की स्कूल मीटिंग याद रखना, माँ की दवा का समय ध्यान रखना, पिता की खामोशी में छिपा अकेलापन समझ लेना, जीवनसाथी के चेहरे पर उभरती चिंता को बिना पूछे पढ़ लेना—ये सब भी जिम्मेदारियाँ हैं। इनका कोई वेतन नहीं होता, लेकिन ये हर दिन निभाई जाती हैं। इन्हीं अदृश्य जिम्मेदारियों को मनोविज्ञान इमोशनल लेबर कहता है। पर जीवन की भाषा में इसका अर्थ शायद इतना भर है—दूसरों की भावनाओं का भार उठाकर भी मुस्कुराते रहना।

जो दिखाई नहीं देता, उसका धन्यवाद भी नहीं मिलता

समाज ने मेहनत को पहचानना सीखा, लेकिन भावनात्मक मेहनत को नहीं। जो दफ़्तर जाता है, उसे काम करने वाला कहा जाता है। लेकिन जो पूरे घर का भावनात्मक संतुलन बनाए रखता है, उसे बस “संवेदनशील” कह दिया जाता है। जैसे संवेदनशील होना कोई सहज स्वभाव हो, कोई थकाने वाला श्रम नहीं।

धीरे-धीरे वही व्यक्ति घर की भावनाओं का प्रहरी बन जाता है। उसे याद रहता है कि किसे क्या पसंद है, किस बात से कौन आहत हो जाएगा, किस रिश्तेदार को फ़ोन करना है, किस अवसर पर क्या भूलना नहीं है। वह सब याद रखता है... और धीरे-धीरे स्वयं को भूलने लगता है।

भारतीय घरों की अनकही कहानी

हमारे घरों में बहुत-सी बातें कभी कही नहीं जातीं, बस जी जाती हैं। बहुत-सी बेटियाँ बचपन से लोगों का मन पढ़ना सीखती हैं। कौन नाराज़ है, किससे धीरे बात करनी है, किसकी पसंद का भोजन बनाना है, मेहमान आएँ तो किसका स्वागत पहले करना है—ये सब उन्हें बिना किसी किताब के सिखा दिया जाता है।

दूसरी ओर, बहुत-से बेटे यह सीखते हुए बड़े होते हैं कि मजबूत बनना है, समाधान देना है, कमज़ोरी नहीं दिखानी है। वे जिम्मेदारियाँ निभाना सीखते हैं, लेकिन भावनाओं की भाषा उनसे अक्सर छूट जाती है।

यहीं से रिश्तों में दो अलग-अलग संसार जन्म लेते हैं।

एक व्यक्ति सोचता है—“मैंने इस घर के लिए सब कुछ किया।”

दूसरा सोचता है—“मैंने इस घर को भीतर से टूटने नहीं दिया।”

और सच यह है कि दोनों अपनी-अपनी जगह सही होते हैं।

शिकायतें एक दिन में नहीं बनतीं

कोई रिश्ता अचानक भारी नहीं हो जाता। वह हर उस दिन थोड़ा-थोड़ा थकता है, जब एक ही व्यक्ति सब कुछ याद रखता है। जब हर जन्मदिन उसी को याद रहता है। हर त्योहार की तैयारी उसी के हिस्से आती है। हर झगड़े के बाद बातचीत शुरू करने की पहल भी वही करता है। हर बार वही सोचता है कि बच्चों पर इसका क्या असर पड़ेगा। और एक दिन वही सुन लेता है—“तुम करती ही क्या हो?” उस क्षण केवल शब्द चोट नहीं पहुँचाते। उस क्षण वर्षों की अनदेखी भीतर कहीं चुपचाप टूट जाती है।

मानसिक थकान की कोई आवाज़ नहीं होती

हर थकान आँसुओं में नहीं बहती। कुछ थकानें चुप्पी बन जाती हैं। कुछ मुस्कुराहटों के पीछे छिप जाती हैं। कुछ हर छोटी बात पर झुँझलाहट बनकर बाहर आती हैं और कुछ इतनी भीतर चली जाती हैं कि व्यक्ति को खुद भी समझ नहीं आता कि अब किसी के लिए कुछ करने का मन क्यों नहीं करता। यह केवल थक जाना नहीं है। यह अपने भीतर की रोशनी का धीरे-धीरे कम हो जाना है। जो हर समय दूसरों को संभालता है, उसे भी कभी किसी का सहारा चाहिए। लेकिन अक्सर वही सबसे अंत में पूछा जाता है—“तुम कैसी हो?”

संयुक्त परिवारों में भार....?

संयुक्त परिवारों में रिश्ते केवल पति-पत्नी के बीच नहीं रहते। वहाँ कई पीढ़ियों की उम्मीदें एक साथ रहती हैं। बहू केवल एक रिश्ता नहीं निभाती। उसे कई रिश्तों के बीच संतुलन बनाना होता है। मायका और ससुराल, बच्चों और बुज़ुर्गों, परंपरा और समय—सबके बीच एक अदृश्य पुल बनना पड़ता है। घर में शांति बनी रहती है, तो शायद ही कोई पूछता है कि यह शांति किसने बनाए रखी।

लेकिन जिस दिन घर का वातावरण बिगड़ जाए, सबसे पहले उसी व्यक्ति की ओर देखा जाता है जिसने वर्षों तक उसे संभाला था। 

चुप्पियाँ भी कम भारी नहीं होतीं

यह कहानी केवल महिलाओं की नहीं है। बहुत-से पुरुष भी अपने हिस्से का अदृश्य बोझ उठाते हैं।

उन्हें सिखाया जाता है कि उनकी कीमत उनकी कमाई से तय होगी। इसलिए वे अपने डर छिपा लेते हैं। अपनी असफलताओं को भीतर रख लेते हैं। उन्हें रोने की जगह कम मिलती है। जब उनसे कहा जाता है—“तुम मुझे समझते नहीं”—तो कई बार वे सचमुच टूट जाते हैं। क्योंकि उनकी समझ में प्रेम का अर्थ जिम्मेदारी निभाना रहा है और सामने वाले की समझ में प्रेम का अर्थ भावनात्मक उपस्थिति भी है। यहाँ कोई गलत नहीं होता। केवल दोनों की भाषाएँ अलग होती हैं।

रिश्ते तब हल्के होते हैं, जब भार साझा होता है

साझेदारी का अर्थ केवल काम बाँटना नहीं है। साझेदारी का अर्थ है—किसी का मानसिक भार भी अपने हिस्से में लेना। कभी पूछ लेना—“आज तुम्हें किस बात ने सबसे ज़्यादा थका दिया?”

कभी बिना याद दिलाए कोई जिम्मेदारी निभा देना। कभी केवल सुन लेना, बिना सलाह दिए।

कभी इतना भर कहना—“आज तुम आराम करो, बाकी मैं देख लूँगा।”

विश्वास मानिए, कई बार यही छोटे वाक्य रिश्ते में उतनी मरहम रखते हैं, जितनी कोई बड़ी बात नहीं रख पाती।

प्रेम की सुंदर पहचान

घर केवल दीवारों, रोटियों और सामान से घर नहीं बनता। घर तब बनता है जब वहाँ किसी की थकान अकेली नहीं रह जाती। जो व्यक्ति हर दिन सबका मन संभालता है, उसे भी एक ऐसा कंधा चाहिए जहाँ वह कुछ देर के लिए अपना मन रख सके। रिश्ते तब सबसे सुंदर लगते हैं जब दोनों यह महसूस करें कि मुझे इस जीवन का सारा भार अकेले नहीं उठाना है।” यही एहसास प्रेम को केवल भावना नहीं रहने देता, उसे जीवन का सबसे सुरक्षित आश्रय बना देता है।

अंत में...

रिश्ते शब्दों से कम और अदृश्य श्रम से अधिक टिके रहते हैं। जो व्यक्ति हर दिन घर की भावनाओं को बिखरने से बचाता है, वह केवल अपना कर्तव्य नहीं निभा रहा होता, वह उस वातावरण की रक्षा कर रहा होता है जिसमें बाकी सभी लोग बिना डर के साँस ले सकें।

शायद प्रेम का सबसे सच्चा रूप यही है—किसी की मुस्कान के पीछे छिपी थकान को देख लेना, बिना कहे उसका भार थोड़ा-सा अपने कंधे पर रख लेना, और उसे यह एहसास दिलाना कि तुम अकेले नहीं हो।”

क्योंकि जिस दिन रिश्तों में यह अदृश्य श्रम दोनों दिशाओं में बहने लगेगा, उसी दिन शिकायतों की जगह सुकून लौट आएगा, संवाद फिर सहज हो जाएगा, और साथ रहना जिम्मेदारी नहीं, एक साझा विश्राम जैसा महसूस होगा।

 

बुधवार, 5 अगस्त 2026

कठिनाई सफलता का शत्रु नहीं, शिक्षक है

हर चीज़ आसान होने से पहले कठिन होती है

संघर्ष, अभ्यास और धैर्य ही सफलता की वास्तविक कुंजी हैं


क्या आपको भी कभी लगा है कि यह काम मेरे बस का नहीं है
?

यदि आपका उत्तर "हाँ" है, तो आप अकेले नहीं हैं।

जीवन में लगभग हर व्यक्ति किसी-न-किसी मोड़ पर यह महसूस करता है कि उसका लक्ष्य बहुत कठिन है। चाहे प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी हो, नई भाषा सीखनी हो, व्यवसाय शुरू करना हो, पुस्तक लिखनी हो या जीवन में कोई बड़ा सपना पूरा करना हो—हर शुरुआत कठिन लगती है।

लेकिन यही जीवन का सबसे बड़ा सत्य है—

"हर चीज़ आसान होने से पहले कठिन होती है।"

यही वह विचार है जो असफलता और सफलता के बीच की दूरी तय करता है।

कठिनाई सफलता का शत्रु नहीं, शिक्षक है

अक्सर लोग कठिनाइयों को देखकर पीछे हट जाते हैं। उन्हें लगता है कि शायद वे इस कार्य के योग्य नहीं हैं। जबकि वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है।

कठिनाई यह नहीं बताती कि आप असफल हैं, बल्कि यह बताती है कि आप कुछ नया सीख रहे हैं।

याद कीजिए—

  • जब आपने पहली बार साइकिल चलाई थी।
  • जब पहली बार मंच पर बोलने गए थे।
  • जब पहली बार कंप्यूटर या मोबाइल चलाना सीखा था।
  • जब पहली बार किसी कठिन परीक्षा की तैयारी की थी।

क्या तब सब कुछ आसान था?

बिल्कुल नहीं।

लेकिन आज वही कार्य सहज लगता है, क्योंकि आपने अभ्यास किया।

प्रकृति भी यही संदेश देती है

प्रकृति का प्रत्येक दृश्य हमें संघर्ष का महत्व सिखाता है।

बीज मिट्टी में दबकर संघर्ष करता है, तब जाकर वृक्ष बनता है।

तितली अपने कोकून को तोड़कर बाहर निकलती है, तभी उसके पंख मजबूत होते हैं।

हीरा अत्यधिक दबाव सहकर ही चमकता है।

सोना आग में तपकर ही कुंदन बनता है।

यदि संघर्ष समाप्त हो जाए, तो विकास भी रुक जाएगा।

महापुरुषों की वाणी में अभ्यास का महत्व

संत कबीरदास का प्रसिद्ध दोहा आज भी उतना ही प्रासंगिक है—

"करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान।
रसरी आवत-जात ते, सिल पर परत निसान॥"

इस दोहे का संदेश स्पष्ट है—निरंतर अभ्यास असंभव को भी संभव बना देता है।

संस्कृत की एक प्रसिद्ध सूक्ति हमें कर्म का महत्व समझाती है—

"उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥"

अर्थात् केवल इच्छा करने से नहीं, बल्कि परिश्रम करने से ही सफलता मिलती है।

लोकजीवन की यह कहावत भी हमें प्रेरित करती है—

"जहाँ चाह, वहाँ राह।"

आज की सबसे बड़ी समस्या—तुरंत सफलता की चाह

आज का युग "Instant Results" का युग बन गया है।

हम चाहते हैं—

  • एक महीने में अंग्रेज़ी सीख लें।
  • कुछ दिनों में प्रतियोगी परीक्षा निकाल लें।
  • कुछ महीनों में करोड़पति बन जाएँ।
  • बिना मेहनत के प्रसिद्धि मिल जाए।

सोशल मीडिया हमें सफलता का परिणाम दिखाता है, लेकिन उसके पीछे छिपे वर्षों के संघर्ष को नहीं दिखाता।

यही कारण है कि लोग दूसरों की सफलता देखकर स्वयं को असफल समझने लगते हैं।

विद्यार्थियों के लिए एक संदेश

यदि आप विद्यार्थी हैं और पढ़ाई कठिन लग रही है, तो याद रखिए—

पहले दिन कोई भी गणित नहीं समझता।

पहले दिन कोई भी अच्छी भाषा नहीं बोलता।

पहले दिन कोई भी मंच का श्रेष्ठ वक्ता नहीं बनता।

हर विशेषज्ञ कभी एक नौसिखिया था।

अंतर केवल इतना है कि उसने अभ्यास करना नहीं छोड़ा।

 जीवन बदलने वाले पाँच सूत्र

v कठिनाई से मत भागिए।

v प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा अभ्यास कीजिए।

v अपनी तुलना दूसरों से नहीं, कल के अपने आप से कीजिए।

v असफलता को अनुभव समझिए।

v धैर्य रखिए—समय सबसे बड़ा शिक्षक है।

निष्कर्ष

जीवन का सबसे बड़ा सत्य यही है कि कोई भी सफलता रातोंरात नहीं मिलती। हर उपलब्धि के पीछे संघर्ष, अनुशासन, धैर्य और निरंतर अभ्यास छिपा होता है।

जब भी कोई कार्य कठिन लगे, स्वयं को यह याद दिलाइए—

"आज जो कठिन है, वही कल मेरी सबसे बड़ी शक्ति बनेगा।"

और फिर पूरे आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़िए।

क्योंकि...

"हर चीज़ आसान होने से पहले कठिन होती है।"

                                                          आज का प्रेरक विचार

"सफलता मंज़िल नहीं, बल्कि निरंतर सीखने, गिरने, उठने और आगे बढ़ने की यात्रा है।"

 

     - डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा

 


स्त्री का मौन

        स्त्री का मौन : जिसे सुनना अभी बाकी है

                        बदलते समाज में स्त्री की आकांक्षाओं को समझने का एक प्रयास


"आजकल की महिलाएँ बहुत बदल गई हैं।" यह वाक्य हम अक्सर सुनते हैं। कभी यह प्रशंसा के रूप में कहा जाता है, तो कभी आलोचना के रूप में। इसके साथ ही एक और प्रश्न बार-बार उठता है—"आख़िर आज की महिला चाहती क्या है?"

इस प्रश्न का उत्तर खोजने से पहले हमें यह स्वीकार करना होगा कि महिला कोई एकरूपी वर्ग नहीं है। उसकी परिस्थितियाँ, भूमिकाएँ, सपने और संघर्ष अलग-अलग हो सकते हैं। गाँव की महिला की चुनौतियाँ महानगर की महिला से भिन्न हैं। गृहिणी की प्राथमिकताएँ कामकाजी महिला से अलग हो सकती हैं। फिर भी एक बात समान है—हर महिला सबसे पहले एक मनुष्य है, जिसकी भावनाएँ, आकांक्षाएँ और आत्मसम्मान है। इसलिए उसकी अपेक्षाओं को किसी विशेषाधिकार की माँग नहीं, बल्कि मानवीय अधिकारों की स्वाभाविक अभिव्यक्ति के रूप में समझना चाहिए।

आज की महिला सबसे पहले सम्मान चाहती है। सम्मान का अर्थ केवल औपचारिक आदर नहीं है। इसका अर्थ है—उसकी बात को गंभीरता से सुना जाए, उसके विचारों को महत्त्व दिया जाए और उसे निर्णय लेने योग्य व्यक्ति माना जाए। परिवार में यदि पुरुष का मत महत्त्वपूर्ण है, तो महिला की राय भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण होनी चाहिए। सम्मान वहीं जीवित रहता है जहाँ समानता का भाव होता है।

महिला विश्वास भी चाहती है। किसी भी संबंध की नींव संदेह नहीं, विश्वास होता है। जब उसके चरित्र, उसकी निष्ठा या उसके निर्णयों पर बिना कारण प्रश्न उठाए जाते हैं, तब केवल उसका आत्मविश्वास ही नहीं टूटता, बल्कि संबंधों की नींव भी कमजोर होने लगती है। विश्वास किसी रिश्ते का सबसे बड़ा उपहार है, जिसे खरीदा नहीं जा सकता, केवल अर्जित किया जा सकता है।

आज की महिला भावनात्मक सहयोग की भी अपेक्षा रखती है। समाज अक्सर महिलाओं को त्याग, धैर्य और सहनशीलता का प्रतीक मानता है, लेकिन यह भूल जाता है कि वे भी थकती हैं, वे भी टूटती हैं और उन्हें भी सहारे की आवश्यकता होती है। उन्हें हर समस्या का समाधान नहीं चाहिए; कई बार केवल इतना चाहिए कि कोई उनकी बात ध्यान से सुन ले और यह विश्वास दिलाए कि वे अकेली नहीं हैं।

समय के साथ महिलाओं में आर्थिक और व्यक्तिगत आत्मनिर्भरता की आकांक्षा भी बढ़ी है। यह परिवार से दूरी बनाने की इच्छा नहीं, बल्कि अपनी क्षमताओं को पहचानने और उन्हें सार्थक दिशा देने की इच्छा है। वह अपने निर्णय स्वयं लेने, अपनी प्रतिभा विकसित करने और अपनी पहचान बनाने का अवसर चाहती है। आत्मनिर्भर महिला परिवार के लिए चुनौती नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी शक्ति बन सकती है।

एक सभ्य समाज की पहचान उसकी ऊँची इमारतों या तकनीकी प्रगति से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि वहाँ महिलाएँ कितनी सुरक्षित हैं। सुरक्षा केवल शारीरिक नहीं होती; मानसिक, सामाजिक और डिजिटल सुरक्षा भी उतनी ही आवश्यक है। जब कोई महिला बिना भय के शिक्षा प्राप्त कर सके, काम कर सके और स्वतंत्र रूप से अपने विचार व्यक्त कर सके, तभी वास्तविक विकास संभव है।

आज की महिला परिवार में साझेदारी चाहती है। वह यह नहीं कहती कि उसकी जिम्मेदारियाँ समाप्त कर दी जाएँ, बल्कि वह चाहती है कि जिम्मेदारियाँ साझा हों। घर केवल उसका नहीं है, इसलिए घर के कार्य भी केवल उसी की जिम्मेदारी नहीं होने चाहिए। जब पति-पत्नी सहयोगी बनते हैं, तभी परिवार में संतुलन और सौहार्द बना रहता है।

आधुनिक जीवन की व्यस्तता ने रिश्तों से संवाद कम कर दिया है। ऐसे में महिला की सबसे बड़ी अपेक्षाओं में से एक है—समय और संवाद। महँगे उपहारों से अधिक मूल्यवान वह समय होता है, जो कोई अपने प्रियजन के लिए निकालता है। किसी महिला की बात धैर्यपूर्वक सुनना, उसकी भावनाओं को समझना और बिना पूर्वाग्रह के उससे संवाद करना किसी भी रिश्ते को गहराई प्रदान करता है।

इसी प्रकार सराहना भी महिलाओं की एक स्वाभाविक अपेक्षा है। परिवार और समाज के लिए किए गए उनके निरंतर प्रयासों को यदि सहज मानकर अनदेखा कर दिया जाए, तो यह अन्याय है। एक सच्ची प्रशंसा, एक धन्यवाद या एक आत्मीय मुस्कान कई बार उन पुरस्कारों से अधिक मूल्यवान होती है, जिनकी हम कल्पना करते हैं।

महिला चाहती है कि परिवार और समाज के महत्वपूर्ण निर्णयों में उसकी सार्थक भागीदारी हो। वह केवल जिम्मेदारियों का निर्वहन करने वाली नहीं, बल्कि निर्णय लेने की प्रक्रिया की सहभागी भी है। जब उसकी राय को सम्मान मिलता है, तब वह स्वयं को परिवार और समाज का अभिन्न अंग अनुभव करती है।

सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि महिला अपने आत्मसम्मान के साथ समझौता नहीं करना चाहती। प्रेम और सम्मान एक-दूसरे के पूरक हैं। जहाँ सम्मान नहीं है, वहाँ संबंध धीरे-धीरे औपचारिकता में बदल जाते हैं। इसलिए किसी भी स्वस्थ संबंध की पहली शर्त है—परस्पर सम्मान।

यह भी स्वीकार करना होगा कि समाज केवल महिलाओं से ही अपेक्षाएँ नहीं रख सकता। जैसे पुरुषों की अपनी चुनौतियाँ और संघर्ष हैं, वैसे ही महिलाओं की भी अपनी परिस्थितियाँ हैं। इसलिए किसी भी परिवार या समाज की सफलता तब संभव है, जब अधिकार और कर्तव्य, स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व, संवेदनशीलता और समानता—सभी के बीच संतुलन स्थापित हो।

अंततः प्रश्न यह नहीं है कि "आज की महिला क्या चाहती है?" वास्तविक प्रश्न यह है कि "क्या हम उसे वह वातावरण दे पा रहे हैं, जहाँ वह सम्मान, विश्वास और आत्मसम्मान के साथ अपना जीवन जी सके?" यदि इसका उत्तर "हाँ" है, तो न केवल महिलाएँ सशक्त होंगी, बल्कि परिवार अधिक मजबूत होंगे, समाज अधिक संवेदनशील होगा और राष्ट्र अधिक प्रगतिशील बनेगा।

स्त्री और पुरुष प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि जीवन-रथ के दो पहिए हैं। दोनों में से किसी एक की उपेक्षा समाज की गति को असंतुलित कर देती है। इसलिए समय की सबसे बड़ी आवश्यकता अधिकारों की बहस नहीं, बल्कि परस्पर सम्मान, संवाद, संवेदनशीलता और साझेदारी की संस्कृति का निर्माण है। यही एक स्वस्थ परिवार, समतामूलक समाज और विकसित राष्ट्र की आधारशिला है।

                                                                                                                   — डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा

रिश्तों का अदृश्य श्रम: जो दिखाई नहीं देता

                 रिश्तों का अदृश्य श्रम: जो दिखाई नहीं देता किसी भी रिश्ते को बाहर से देखिए , वह अक्सर दो लोगों की कहानी दिखाई देता है। दो च...