स्त्री को पढ़िए नहीं, उसे सुनिए
स्त्री का मन कोई पहेली नहीं है, जिसे हल करने के लिए किसी विशेष सूत्र की आवश्यकता हो। वह एक जीवंत संसार है, जो अनुभवों, स्मृतियों, आकांक्षाओं, संघर्षों और प्रेम से निर्मित होता है। उसे समझने के लिए सबसे पहले यह स्वीकार करना होगा कि प्रत्येक स्त्री की कहानी अलग है और उसकी भावनाओं का अर्थ वही तय करने का सबसे विश्वसनीय आधार है, जिसे वह स्वयं व्यक्त करती है। उसकी मुस्कान को देखकर उसकी सारी पीड़ा समाप्त घोषित मत कीजिए। उसके मौन को अपनी सुविधा के अनुसार सहमति मत मानिए। उसके त्याग की प्रशंसा करते हुए यह मत भूलिए कि उसे भी सहयोग, विश्राम और अपने लिए समय चाहिए। उसके प्रेम को उसकी आत्मविस्मृति की शर्त मत बनाइए।
यदि वह माँ है, तो उसकी मातृत्व-भावना का सम्मान कीजिए; लेकिन उसके भीतर जीवित उस स्त्री को भी पहचानिए, जिसके अपने सपने हैं। यदि वह पत्नी है, तो उसके साथ जीवन की साझेदारी कीजिए; उसे केवल परिवार की जिम्मेदारियों का प्रबंधक मत बनाइए। यदि
वह बेटी है, तो उसे सुरक्षा के साथ निर्णय लेने की
स्वतंत्रता भी दीजिए। यदि वह बहू है, तो उससे परिवार में अपनापन बनाने की अपेक्षा करने के साथ परिवार को भी उसके
प्रति आत्मीय होने का अवसर दीजिए।
और यदि वह केवल अपने लिए कुछ समय चाहती है, तो उसके इस अधिकार को किसी स्पष्टीकरण की आवश्यकता से मुक्त रखिए।
हमें यह समझना होगा कि स्त्री का सम्मान किसी विशेष दिवस पर दिए गए भाषण, प्रशंसा के शब्दों या आदर्शों के ऊँचे आसन से पूरा नहीं
होता। उसका सम्मान उन क्षणों में दिखाई देता है, जब उसकी बात सुनी जाती है, उसके निर्णयों को
महत्त्व दिया जाता है, उसके श्रम को पहचाना जाता है और उसकी
स्वतंत्रता को स्वीकार किया जाता है।
कभी-कभी उसे समाधान की नहीं, सहानुभूति की
आवश्यकता होती है। कभी उसे सलाह से अधिक विश्वास चाहिए होता है। कभी उसे किसी के
सामने मजबूत बने रहने की आवश्यकता नहीं होती; वह केवल अपनी थकान स्वीकार करना चाहती है। और कभी वह किसी सहारे की प्रतीक्षा
नहीं कर रही होती, बल्कि अपने पैरों पर खड़े होकर आगे बढ़ना
चाहती है।
इन सभी स्थितियों में उसे समझने का तरीका अलग हो सकता है, लेकिन आधार एक ही है—उसकी बात सुनना और उसके अनुभव को
गंभीरता से लेना।
स्त्री को समझने के लिए उसके मन में प्रवेश करने का दावा मत कीजिए। उसके सामने
ऐसा वातावरण बनाइए, जिसमें वह अपने मन के दरवाजे स्वयं खोल
सके। उसके जीवन के निर्णय अपने हाथों में लेने की कोशिश मत कीजिए। उसके साथ बैठकर
उन निर्णयों पर संवाद कीजिए। उसे अपने आदर्श के अनुरूप ढालने का प्रयास मत कीजिए।
उसे अपनी वास्तविकता के साथ स्वीकार कीजिए। क्योंकि स्त्री होना केवल किसी की माँ, पत्नी, बेटी या बहू होना
नहीं है। स्त्री होना अपने भीतर एक संपूर्ण मनुष्य को जीवित रखना भी है।
उसकी पहचान केवल इस बात में नहीं कि उसने दूसरों के लिए कितना कुछ किया, बल्कि इसमें भी है कि उसे अपने जीवन में कितना कुछ बनने, सीखने, चुनने और अनुभव
करने का अवसर मिला।
एक बेहतर समाज वही होगा, जहाँ स्त्री को
अपने अस्तित्व और अपने संबंधों के बीच किसी एक को चुनने के लिए बाध्य न होना पड़े; जहाँ वह परिवार से प्रेम करते हुए भी स्वयं से प्रेम कर सके; जहाँ वह दूसरों की खुशियों में सहभागी बनते हुए अपनी
प्रसन्नता को भी महत्त्व दे सके; जहाँ उसका त्याग
स्वाभाविक प्रेम का हिस्सा हो, अनिवार्य नियति
नहीं।
आखिरकार, किसी मनुष्य को प्रेम करने का सबसे सुंदर
तरीका उसे अपने अनुरूप बना देना नहीं, बल्कि उसे उसके वास्तविक स्वरूप में विकसित होने का अवसर देना है।
स्त्री को पढ़ने की कोशिश करने से पहले उसे सुनिए। उसे समझाने से पहले उसकी
बात समझिए। उसके लिए निर्णय लेने से पहले उसकी इच्छा पूछिए। और उसके मौन को अपनी
सुविधा का उत्तर बनाने से पहले यह सुनिश्चित कीजिए कि उसे बोलने की स्वतंत्रता
प्राप्त है।
हो सकता है, तब आपको पता चले कि स्त्री का मन उतना
जटिल नहीं था, जितना आपने समझ रखा था। जटिल तो वे
धारणाएँ थीं, जिनके कारण आप उसके सरल-से मानवीय आग्रह
को पहचान नहीं पाए। वह कोई असाधारण माँग नहीं कर रही थी। वह केवल यह चाहती थी कि
उसके होने को भी उतनी ही सहजता से स्वीकार किया जाए, जितनी सहजता से वह दूसरों के होने को स्वीकार करती रही है।
वह प्रेम चाहती है, पर प्रेम में अपना
अस्तित्व खोकर नहीं। वह परिवार चाहती है, पर अपने सपनों की कीमत पर नहीं। वह साथ चाहती है, पर अपनी आवाज की बलि देकर नहीं। वह दूसरों के लिए जीना
चाहती है, पर अपने लिए जीने का अधिकार बचाए रखते
हुए।
शायद स्त्री के मन को समझने की शुरुआत यहीं से होती है—जब हम उससे यह पूछना
बंद कर देते हैं कि वह हमारे लिए क्या-क्या कर सकती है और यह पूछना शुरू करते हैं
कि एक मनुष्य के रूप में वह स्वयं क्या चाहती है। और जब यह प्रश्न केवल शब्दों में
नहीं, हमारे व्यवहार में भी उतरने लगता है, तभी संवेदना सम्मान में, सम्मान समानता में और समानता एक बेहतर मानवीय समाज में बदलने लगती है।
