स्त्री के मन का अनकहा दर्द
प्रस्तावना : कभी-कभी किसी स्त्री के लिए सबसे बड़ा
दर्द वह नहीं होता जो उसके साथ हुआ, बल्कि वह होता है जिसे महसूस करने के बाद भी किसी ने समझने की
कोशिश नहीं की। एक पुरुष के लिए जो बात कुछ क्षणों की घटना हो सकती है, वही बात एक स्त्री के भीतर कई दिनों,
महीनों या कभी-कभी वर्षों तक चलती रहती
है। क्योंकि स्त्री केवल शब्द नहीं सुनती, वह उन शब्दों के पीछे छिपा भाव भी महसूस करती है। उसकी चुप्पी
हमेशा शांति नहीं होती। उसकी मुस्कान हमेशा खुशी नहीं होती। और उसका “मैं ठीक हूँ”
हमेशा सच नहीं होता।
यह लेख उसी अनकही दुनिया को समझने की एक
कोशिश है—उस स्त्री की दुनिया, जो
सबको समझते-समझते कई बार खुद को ही समझाना भूल जाती है।
इतनी-सी बात थी…: कई बार किसी पुरुष के लिए कोई बात बस एक घटना होती है। वह उसे कहकर, करके या भूलकर आगे बढ़ जाता है। लेकिन उसी “इतनी-सी बात” के भीतर एक स्त्री कई रातें जाग सकती है। क्योंकि स्त्री केवल घटना नहीं जीती, वह उस घटना से जुड़े हर भाव को भी जीती है। उसे शब्द याद रहते हैं। आवाज़ का उतार-चढ़ाव याद रहता है। चेहरे पर आई बेरुख़ी याद रहती है। कमरे का सन्नाटा याद रहता है। यहाँ तक कि उस समय खिड़की से आती धूप भी याद रहती है। उसके भीतर यादें केवल तस्वीर बनकर नहीं रहतीं, वे एहसास बनकर बस जाती हैं।
एक शब्द भी कभी-कभी बहुत कुछ तोड़ देता है : जब कोई पुरुष गुस्से में कह देता है—
“तुम्हें हर बात का ड्रामा करना आता है।”
तो उसके लिए वह शायद सिर्फ़ एक वाक्य होता है। लेकिन एक स्त्री उस वाक्य में अपने पूरे अस्तित्व का फैसला सुन लेती है। उसे लगने लगता है कि शायद उसकी तकलीफ़ सच में किसी के लिए बोझ है। उस दिन के बाद वह कई बार बोलने से पहले रुकती है। कई बार रोना रोक लेती है। कई बार मुस्कुराने की कोशिश करती है, ताकि कोई यह न कह दे—
“फिर शुरू हो गई।”
और फिर धीरे-धीरे वह अपने ही दुख की गवाह बन जाती है।
जब दर्द को दर्द नहीं माना जाता : स्त्री की गहरी पीड़ा तब जन्म लेती है, जब उसे महसूस होता है कि उसके दर्द को किसी ने दर्द माना ही नहीं। जब वह कहती है—
“मुझे बुरा लगा।” और जवाब मिलता है— “तुम बेवजह सोचती हो।”
उस पल उसका दुख आधा नहीं होता, दोगुना हो जाता है। क्योंकि अब उसे अपने आँसुओं का भी सबूत देना पड़ता है। उसे
यह साबित करना पड़ता है कि जो उसे महसूस हुआ, वह सच था। और इससे बड़ी विडंबना शायद कोई नहीं कि इंसान को अपने ही दर्द की
सच्चाई साबित करनी पड़े।
सबसे बड़ी लड़ाई अक्सर अपने ही मन से होती है : एक स्त्री अपने जीवन में सबसे ज़्यादा लड़ाई हमेशा दुनिया से नहीं लड़ती। कई बार वह अपने ही मन से लड़ती रहती है।
“शायद गलती मेरी होगी…”, “शायद मैं ज़्यादा उम्मीद करती हूँ…”, “शायद मुझे चुप ही रहना चाहिए…”
यही “शायद” धीरे-धीरे उसकी आवाज़ खा जाते हैं। वह हर बात को कहने से पहले
सोचती है। हर शिकायत को रोकती है। हर आँसू को छिपाती है और एक दिन उसे खुद भी समझ
नहीं आता कि वह कब अपने ही भावनाओं से दूर होती चली गई।
उसे बातें नहीं, उन बातों में छिपे भाव याद रहते हैं : लोग अक्सर कहते हैं कि स्त्रियाँ छोटी-छोटी बातें याद रखती हैं। लेकिन शायद उन्हें बातें नहीं याद रहतीं। उन्हें उन बातों में छिपा अपनापन या उपेक्षा याद रहती है। उन्हें वह दिन याद रहता है, जब बुखार में भी उन्होंने सबके लिए खाना बनाया और किसी ने एक बार भी नहीं पूछा— “तुमने दवा ली?”
उन्हें वह शाम याद रहती है, जब पूरा घर हँस
रहा था और वह रसोई में अकेली चुपचाप बर्तन धो रही थीं। उन्हें वह जन्मदिन याद रहता
है, जिसमें सबके लिए केक था, लेकिन उनके हिस्से में सिर्फ़ काम आया। उन्हें वह रात याद
रहती है, जब बहुत रोना था, लेकिन बच्चे की नींद न टूटे इसलिए तकिए में चेहरा छिपाकर
रोईं। ये छोटी बातें नहीं होतीं। इनके भीतर छिपी होती है एक स्त्री की वह इच्छा कि
कोई उसे भी उसी तरह देखे, जैसे वह हर किसी को देखती है।
भीड़ में भी अकेली : स्त्री का अकेलापन भी अजीब होता है। वह भीड़ में बैठकर अकेली हो सकती है। पूरा परिवार उसके आसपास हो सकता है, फिर भी उसे लग सकता है कि उसकी बात सुनने वाला कोई नहीं। वह खाना परोसते हुए सबकी पसंद जानती है, लेकिन कई बार कोई उसकी पसंद नहीं जानता। वह सबकी थकान पहचान लेती है, लेकिन उसकी थकान को लोग उसका स्वभाव समझ लेते हैं। उसके चेहरे की मुस्कान देखकर लोग कहते हैं— “देखो, कितनी खुश है।” कोई यह नहीं देख पाता कि वह मुस्कान कई बार केवल घर का संतुलन बचाने के लिए पहनी गई होती है।
वह कम रोती नहीं, बस अपने आँसू छिपाना सीख जाती है : स्त्री रोती कम इसलिए नहीं कि उसे दर्द कम होता है। वह रोती कम इसलिए है क्योंकि उसे बचपन से सिखाया जाता है कि— “घर टूटना नहीं चाहिए।” इसलिए वह अपने हिस्से का दुख निगलती रहती है। हर बार, थोड़ा-थोड़ा। जब तक कि भीतर कहीं उसकी अपनी आवाज़ धीमी नहीं पड़ जाती। वह दूसरों को संभालते-संभालते खुद को संभालना भूल जाती है।
जब शिकायतें ख़त्म हो जाती हैं : एक दिन ऐसा भी आता है जब वह शिकायत करना छोड़ देती है। बहुत लोग इसे उसकी समझदारी समझ लेते हैं। लेकिन सच यह है कि कई बार वह बोलना इसलिए छोड़ देती है क्योंकि उसे यक़ीन हो जाता है कि उसकी बात सुनी ही नहीं जाएगी। उस दिन उसके शब्द नहीं मरते। उस दिन उम्मीद मरती है। और उम्मीद की मृत्यु बहुत शांत होती है। उसमें कोई शोर नहीं होता। कोई आँसू भी नहीं होते। बस एक स्त्री पहले जैसी नहीं रहती, वह काम करती रहती है, हँसती रहती है, त्योहार मनाती रहती है, सबका ध्यान रखती रहती है। लेकिन उसके भीतर एक कमरा हमेशा के लिए बंद हो जाता है।
उस बंद कमरे में बहुत कुछ रह जाता है : उस कमरे में उसके अधूरे सवाल पड़े रहते हैं। वह प्यार, जो कभी पूरा नहीं मिला। वे गले लगना, जो कभी नहीं हुआ। वह “कैसी हो?”, जो किसी ने सचमुच पूछकर उसका उत्तर नहीं सुना। वह सब कुछ वहीं रह जाता है। बाहर से जीवन चलता रहता है, लेकिन भीतर का एक हिस्सा वहीं ठहर जाता है और शायद यही वह जगह है, जहाँ एक स्त्री सबसे ज़्यादा अकेली होती है।
उसकी मज़बूती की तारीफ़ करने से पहले यह पूछिए… : दुनिया अक्सर स्त्री की मज़बूती की तारीफ़ करती है। “वह कितनी मज़बूत है।” लेकिन कोई यह नहीं पूछता कि उसे इतना मज़बूत बनने की ज़रूरत ही क्यों पड़ी। शायद इसलिए कि जब भी वह टूटी, उसे अपने ही टूटे हुए टुकड़े खुद उठाने पड़े। किसी ने उसके आँसू पोंछे भी, तो अक्सर जल्दी से कहा— “अब बस करो।”
बहुत कम लोगों ने कहा— “रो लो… मैं यहीं हूँ।” और कभी-कभी इन चार शब्दों की ज़रूरत ही सबसे ज़्यादा होती है।
शायद प्रेम का सबसे सुंदर रूप यही है : किसी स्त्री के मन तक पहुँचने के लिए हमेशा बड़े-बड़े वादों की ज़रूरत नहीं होती। कई बार बस इतना काफ़ी होता है कि जब वह कुछ कहे, तो उसे बीच में रोका न जाए। जब वह रोए, तो उसे चुप कराने के बजाय उसका हाथ थाम लिया जाए। जब वह कहे “मैं ठीक हूँ”, तो उसके शब्दों से आगे उसके चेहरे को पढ़ने की कोशिश की जाए और जब वह अपनी कमज़ोरी दिखाए, तो उसे बदलने की कोशिश करने के बजाय उसे स्वीकार किया जाए। क्योंकि स्त्री को हमेशा समाधान नहीं चाहिए। कई बार उसे केवल कोई ऐसा चाहिए होता है, जो उसके दर्द के सामने बैठकर कह सके— “मैं समझता हूँ… तुम अकेली नहीं हो।”
यही भरोसा उसके भीतर फिर से जीवन जगा देता है और शायद यही किसी स्त्री के मन तक पहुँचने का सबसे सच्चा रास्ता है— उसे बदलने की कोशिश किए बिना, उसे पूरा सुन लेना।
निवेदन : अगर इस लेख की कोई बात आपके दिल को छू
गई हो, तो इसे उस व्यक्ति तक
ज़रूर पहुँचाइए जिसे शायद इसकी ज़रूरत है।
कभी-कभी
किसी को बदलने की नहीं, सिर्फ़ उसे समझने की ज़रूरत होती है।
और कभी-कभी किसी के जीवन में सबसे
खूबसूरत वाक्य यही होता है— “तुम बोलो… मैं सुन रहा हूँ।”
* डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 'सुमित'