अपने भीतर के फूल को खिलने दीजिए
सुबह की पहली किरण जब खिड़की से भीतर आती है और बाहर खिले
किसी गुलाब पर ठहरती है, तो वह गुलाब किसी उपलब्धि का
उत्सव नहीं मना रहा होता। वह न किसी से अपनी प्रशंसा की अपेक्षा करता है, न यह जानने की कोशिश करता है कि उसकी सुगंध
कितने लोगों तक पहुँचेगी। उसे यह चिंता भी नहीं होती कि पास का कोई फूल उससे अधिक
सुंदर है।
वह बस खिला है। पूरी
सहजता के साथ, अपनी प्रकृति के साथ।
शायद फूल के इसी सहज खिलने में जीवन का एक गहरा रहस्य छिपा
है।
मनुष्य का जीवन भी संभावनाओं से भरा हुआ है, लेकिन विडंबना यह है कि हम जीवन को जीने से
पहले ही उसके परिणामों का हिसाब लगाने लगते हैं—मैं जो कर रहा हूँ, उसका परिणाम क्या होगा? लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे? मेरी मेहनत की कितनी प्रशंसा होगी? मुझे कितनी सफलता मिलेगी? मेरी पहचान कितनी बड़ी बनेगी?
धीरे-धीरे जीवन अनुभव और आनंद की यात्रा न रहकर अपेक्षाओं, उपलब्धियों और परिणामों का
हिसाब-किताब बन जाता है।
यहीं
फूल हमें एक महत्वपूर्ण सीख देता है— फूल अपनी सुगंध का हिसाब नहीं रखता। वह बस
महकता है।
दूसरों से तुलना क्यों?
एक गुलाब को गुलाब होने के लिए किसी दूसरे फूल की पहचान की
आवश्यकता नहीं होती। वह कमल बनने की कोशिश नहीं करता और न ही किसी दूसरे फूल से
अपनी तुलना करता है। प्रकृति ने उसे जो रंग, रूप और सुगंध दी है, वह उसी में अपनी पूर्णता खोजता है।
लेकिन मनुष्य अक्सर अपने जीवन का मूल्यांकन दूसरों को देखकर
करने लगता है।
किसी की सफलता हमें अपनी असफलता लगने लगती है। किसी की
उपलब्धि के सामने हमारी उपलब्धियाँ छोटी दिखाई देने लगती हैं। किसी के जीवन की चमक
देखकर हम अपने जीवन की रोशनी पर संदेह करने लगते हैं।
सोशल मीडिया के इस दौर में यह प्रवृत्ति और गहरी हो गई है।
हम दूसरों के जीवन के चुने हुए सुंदर क्षण देखते हैं और उनकी तुलना अपने जीवन की
वास्तविक परिस्थितियों से करने लगते हैं। हमें उनकी मुस्कान दिखाई देती है, लेकिन उनके संघर्ष नहीं; उनकी उपलब्धियाँ दिखाई देती हैं, लेकिन उनके पीछे छिपी असफलताएँ और कठिनाइयाँ
नहीं।
और फिर हमारे भीतर असंतोष जन्म लेने लगता है। लेकिन
जीवन तुलना का नाम नहीं है।
हर
व्यक्ति की यात्रा अलग है।
उसकी परिस्थितियाँ अलग हैं, उसकी क्षमताएँ अलग हैं और उसकी संभावनाएँ भी अलग हैं। इसलिए
जीवन की वास्तविक सुंदरता तब सामने आती है, जब हम दूसरों की तरह बनने की दौड़ छोड़कर अपने भीतर छिपी
संभावनाओं को पहचानना शुरू करते हैं।
आपको
किसी और का फूल बनने की आवश्यकता नहीं है; आपको अपने भीतर के फूल को खिलाना है। अनुकूल
मौसम का इंतजार मत कीजिए
फूल
हमें एक और बड़ी सीख देता है—खिलने के लिए हमेशा अनुकूल मौसम की प्रतीक्षा मत
करो।
फूल यह नहीं कहता कि जब परिस्थितियाँ पूरी तरह मेरे पक्ष
में होंगी, तभी मैं खिलूँगा। वह धूप में
भी खिलता है, वर्षा में भी और कठिन मौसम
के बीच भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। खिलना उसका स्वभाव है।
मनुष्य यदि जीवन भर सही समय, सही परिस्थिति और सही अवसर की प्रतीक्षा करता रहे, तो संभव है कि उसका पूरा जीवन प्रतीक्षा में ही
बीत जाए। जीवन कभी पूरी तरह अनुकूल नहीं होता। इसमें कठिनाइयाँ हैं, असफलताएँ हैं, अनिश्चितताएँ हैं और अधूरेपन की अपनी एक सच्चाई है। फिर
भी जीवन को जीना पड़ता है—
यहीं, अभी और इसी रूप में।
इसलिए
अपने जीवन को किसी भविष्य की शर्त से मत बाँधिए।
यह मत कहिए—जब सब ठीक हो जाएगा, तब मैं प्रसन्न रहूँगा। जब सफलता मिलेगी, तब अपने जीवन का आनंद लूँगा। जब लोग मुझे
पहचानेंगे, तब स्वयं को योग्य समझूँगा।
जीवन
किसी ‘एक दिन’ के इंतजार का नाम नहीं है।
जीवन
वही है, जो इस क्षण हमारे सामने
उपस्थित है।
कर्म की सुगंध
फूल
की सुंदरता केवल उसके रंग और रूप में नहीं होती, बल्कि इस बात में भी होती है कि वह अपने खिलने को प्रदर्शन
नहीं बनाता।
वह यह
घोषणा नहीं करता—
“देखो, मैं कितना सुंदर हूँ।”
वह बस खिलता है और अपनी सुंदरता को स्वाभाविक रूप से व्यक्त
करता है।
मनुष्य भी तब अधिक सुंदर बनता है, जब उसके कर्म उसके अहंकार की घोषणा न होकर उसके
व्यक्तित्व और संस्कारों की सहज अभिव्यक्ति बन जाते हैं।
जो व्यक्ति अच्छा कार्य केवल इसलिए करता है कि लोग उसकी
प्रशंसा करें, वह अपने कर्म की स्वतंत्रता
खो देता है। लेकिन जो व्यक्ति अपने भीतर की अच्छाई के कारण अच्छा करता है, उसका कर्म किसी बाहरी प्रमाण का मोहताज नहीं
होता। हमने किसी की सहायता की और उसने धन्यवाद नहीं दिया। हमने
किसी के लिए अच्छा किया और उसने याद नहीं रखा। हमने
अपनी पूरी क्षमता से काम किया और फिर भी अपेक्षित परिणाम नहीं मिला।
क्या
इसका अर्थ यह है कि हमारा प्रयास व्यर्थ चला गया?
नहीं।
फूल भी तो हर आने-जाने वाले से यह नहीं पूछता कि उसने उसकी
सुगंध महसूस की या नहीं। वह अपनी सुगंध को किसी की स्वीकृति पर निर्भर नहीं करता। उसका
काम है—महकना।
मनुष्य को भी अपने कर्म को दूसरों की प्रतिक्रिया से मुक्त
करने की कला सीखनी होगी। हर अच्छा काम तुरंत दिखाई दे, हर प्रतिभा को तुरंत पहचान मिल जाए और हर
प्रयास का परिणाम तुरंत प्राप्त हो जाए—ऐसा आवश्यक नहीं है।
कभी-कभी हमारी मेहनत का परिणाम हमारी आँखों के सामने नहीं
आता। कभी हमारा एक छोटा-सा व्यवहार किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन में बहुत बड़ा
परिवर्तन ला देता है, जिसका हमें कभी पता ही नहीं
चलता।
किसी विद्यार्थी को कही गई एक प्रेरक बात, किसी निराश व्यक्ति के प्रति व्यक्त किया गया
विश्वास या किसी जरूरतमंद की छोटी-सी सहायता—इनकी सुगंध कितनी दूर तक जाती है, इसका अनुमान लगाना संभव नहीं।
प्रयास हमारा है, परिणाम हमेशा नहीं
इसका अर्थ यह नहीं कि जीवन में लक्ष्य न हों या उपलब्धि का
महत्व न हो। लक्ष्य आवश्यक हैं। प्रयास आवश्यक है। आत्ममूल्यांकन भी
आवश्यक है। लेकिन अपनी संपूर्ण खुशी को केवल परिणामों से बाँध देना
उचित नहीं।
परिणाम हमारे हाथ में हमेशा नहीं होते; प्रयास और दृष्टिकोण पर
हमारा अधिक अधिकार होता है।
फूल हमें इसी संतुलन की शिक्षा देता है—
पूरा प्रयास करो, पूरी तरह खिलो, लेकिन अपनी सुगंध का हिसाब
मत रखो। अंततः सवाल क्या रह जाएगा?
जीवन के अंत में शायद सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं होगा
कि हमने कितनी प्रसिद्धि अर्जित की, कितने लोगों ने हमारी प्रशंसा की या हमारी सुगंध कितनी दूर
तक पहुँची।
शायद
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह होगा—
क्या
हमारे भीतर जो संभावनाएँ थीं, हमने उन्हें जीने का प्रयास किया?
क्या हमने अपनी तुलना दूसरों से करने के बजाय अपनी यात्रा
को समझा?
क्या हमने परिस्थितियों के बदलने की प्रतीक्षा करने के बजाय
उपलब्ध समय में अपना सर्वश्रेष्ठ दिया?
क्या हमने अपने कर्म को अहंकार का माध्यम बनाया या अपने
स्वभाव की अभिव्यक्ति?
और
सबसे बढ़कर—
क्या
हमने अपने भीतर के फूल को खिलने दिया?
यदि
कभी जीवन हमसे पूछे—
“तुमने क्या पाया?”
तो
शायद हमारा सबसे सुंदर उत्तर हो सकता है—
“मैंने अपने भीतर जो था, उसे पूरी तरह खिलने दिया।”
और
यदि कोई पूछे—
“तुम्हारी खुशबू कितने लोगों
तक पहुँची?”
तो
मुस्कुराकर कहना—
“मुझे नहीं मालूम। मैंने कभी
उसका हिसाब नहीं रखा। मेरा काम तो बस खिलना था।”
क्योंकि
फूल का धर्म अपनी सुगंध का लेखा-जोखा रखना नहीं है।
उसका
धर्म है—खिलना, महकना और अपनी प्रकृति को
पूरी तरह जी लेना।
शायद
मनुष्य के जीवन की सबसे सुंदर सार्थकता भी यही है—
दुनिया
हमें कितना याद रखेगी, इसका हिसाब न रखें। बस
इतना सुनिश्चित करें कि जब तक हम हैं, हमारे भीतर का फूल पूरी तरह खिला रहे।
निष्कर्ष : जीवन की सार्थकता इस बात में नहीं कि हमारी सुगंध कितनी दूर तक पहुँची, बल्कि इस बात में है कि हमने अपने भीतर के फूल को कितना खिलने दिया।