बुधवार, 6 मई 2026

वो भाग नहीं रहीं… वो बदल रही हैं

                                                          

                                          वो भाग नहीं रहीं… वो बदल रही हैं                                                                                                                                 


आज के समय में अक्सर यह सुनने को मिलता है कि “लड़कियाँ शादी से भाग रही हैं” या “उन्हें जिम्मेदारियों से डर लगता है।” यह धारणा जितनी सरल लगती है, वास्तविकता उतनी ही गहरी और जटिल है। सच यह है कि लड़कियाँ शादी से नहीं भाग रहीं, बल्कि वे एक ऐसे सामाजिक पैटर्न को तोड़ रही हैं, जिसे उन्होंने वर्षों तक अपने आसपास टूटते हुए देखा है।

हर लड़की अपने जीवन में एक खामोश कहानी की साक्षी होती है। यह कहानी ऊँची आवाज़ों या खुले संघर्षों की नहीं होती, बल्कि उस मौन की होती है, जिसमें बहुत कुछ बिना कहे ही बिखरता रहता है। जो उनके जीवन के प्रति जीने के उत्साह को एक अलग स्तर तक ले जाता है और यह अनुभव उनमें अचानक नहीं आता, बल्कि बचपन से ही अपने इर्द-गिर्द नारियों पर होने वाले दुर्व्यवहार को देखते हुए धीरे-धीरे उसके भीतर आकार लेता है।

वह अपनी दादी को देखती है, जिनका पूरा जीवन “समझौता” शब्द में ही सिमट जाता है। वह अपनी नानी को देखती है, जिन्होंने अपनी इच्छाओं को कभी प्राथमिकता नहीं दी। और फिर वह अपनी माँ को देखती है—घर की सबसे व्यस्त, सबसे जिम्मेदार और सबसे समर्पित घर की सदस्या, जो सुबह से रात तक निरंतर काम करती है, परंतु अक्सर उसे उसका उचित मूल्य सम्मान कभी नहीं मिलता। उसके श्रम को कर्तव्य कहकर सामान्य बना दिया जाता है, और उसकी पहचान धीरे-धीरे उसके परिवार के दायित्वों के नाम पर ही विलीन हो जाती है।

इसके अतिरिक्त, परिवार की अन्य महिलाओं—बुआ, मासी, चाची, ताई—की कहानियाँ भी कितनी ही भिन्न प्रतीत क्यों न होती हों किंतु अंततः एक समान बिंदु पर आकर मिलती हैं। इन सभी कथाओं में भी एक स्त्री धीरे-धीरे स्वयं से दूर होती चली जाती है उसके अपने सपनों, अपनी इच्छाओं और अपनी पहचान से। विडंबना यह है कि इस त्याग और मौन को ही समाज “अच्छी औरत” का दर्जा देता है। जो एक तरह से देखा जाए तो उस स्त्री के प्रति अन्याय ही है।

आज की लड़की इस परंपरा को समझती है। वह यह भली-भांति जानती है कि प्रेम, जिम्मेदारी और समझौते के बीच एक स्पष्ट अंतर होता है। वह संबंधों को महत्व देती है, परंतु अपनी पहचान की कीमत पर नहीं, आज की लड़कियाँ अपनी पहचान पाना चाहती हैं तो उसमें गलत ही क्या है? यह समाज को अब समझना ही पड़ेगा।

वह अपनी जिम्मेदारी और विवाह से नहीं बच रही है; वह उस जीवन से बचना चाहती है, जहाँ उसे स्वयं को सिद्ध करते-करते अपनी ही अस्मिता खो देनी पड़े और कुछ दिनों बाद उनका अपना अस्तित्त्व ही या तो समाप्त हो जाए या फिर घर की आपा-धापी में सिमट कर रह जाए। इसलिए वह अब प्रश्न कर रही हैं, बराबरी की बात करती हैं, अपनी सीमाएँ निर्धारित कर रही है और सबसे महत्वपूर्ण 'स्वयं को प्राथमिकता दे रही है', जो निश्चित रुप से एक नए समाज को जन्म देने वाला साबित होने वाला है। इस नए समाज में हर पुरुष & स्त्री की सहभागिता समान रूप से निर्धारित होने वाली है।

यह परिवर्तन केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक है। यह एक नई चेतना का संकेत है, जहाँ “अच्छी औरत” की परिभाषा पुनः निर्धारित हो रही है। अब एक अच्छी औरत वह नहीं, जो केवल दूसरों की सेवा में अपने जीवन का त्याग और अपना मौन समर्पित ही कराती रहे औए अपने अस्तित्व को भुला दे। किंतु अब यह परिभाषा बदलेगी कि  "एक अच्छी औरत वह है, जो दूसरों के साथ-साथ स्वयं के प्रति भी ईमानदार और सजग रहे।"

अतः यह कहना अधिक उचित होगा कि लड़कियाँ अपनी जिम्मेदारियों अथवा विवाह से नहीं भाग रहीं...... बल्कि वे स्वयं को बदलते समय के अनुरूप पुनर्परिभाषित कर रही हैं। मेरा मानना है कि यह परिवर्तन भविष्य में एक अधिक संतुलित, सम्मानजनक और संवेदनशील समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

                                                                                                                                   डॉ. के. के. शर्मा

वो भाग नहीं रहीं… वो बदल रही हैं

                                                                                                     वो भाग नहीं रहीं… वो बदल रही हैं     ...