शुक्रवार, 27 दिसंबर 2024

भाषा की कोई जाति नहीं

 

भाषा की कोई जाति नहीं

   जैसा कि हम सभी लोग जानते हैं कि, संविधान ने हिंदी भाषा को राजभाषा का दर्जा प्रदान किया हुआ है | इस विषय पर केंद्र से इसका कोई भी स्वरूप निश्चित ही नहीं हो पाया है, इसका सिर्फ और सिर्फ कारण यह है कि हिंदी के स्वरूप को समझने में सभी लोग गलती कर जाते हैं | लोगों का यह मानना हो जाता है कि हिंदी तो सिर्फ उत्तर भारत की भाषा है | ऐसा नहीं है और न ही हमें ऐसा समझना चाहिए बल्कि हिंदी तो संपूर्ण देश की समृद्धि भाषा है | जो कि सिर्फ देश के नागरिकों को ही नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व को एक नया मार्ग दिखाने का सामर्थ  रखती हैं | प्रयोग की दृष्टि से अगर हम देखें तो भाषा के दो रूप होते हैं एक तो वह जो हम प्रतिदिन की अपनी दिनचर्या में या कह लीजिए रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल करते हैं | दूसरा वह जो किसी खास प्रयोजन से या खास मकसद से हम लोग प्रयोग करते हैं | हम बात करते हैं पहले वाली भाषा के बारे में जिसे  आदमी अपने परिवेश में सीखता है, अपने परिवार में सीखता है, अपने समाज में सीखता है | और इसके लिए उसको कोई खास प्रयास नहीं करना पड़ता है बल्कि उसके लिए मात्र यह बोलचाल की भाषा होती है | जिसे वह बड़ी सहजता से ही सीख जाता है | इसमें व्याकरण की शुद्धता का विशेष महत्व नहीं होता और न ही इसमें विशेष आग्रह किया गया होता है | इसे हम बोलचाल की भाषा भी कहते हैं | दूसरे प्रकार की भाषा को सीखना पड़ता है, जिसमें एक मर्यादित ढंग का पालन  और व्याकरण के नियम हमें सीखने पड़ते हैं | अर्थात व्याकरण भाषा हमें सीखनी पड़ती है और इसके लिए सीखने में रुचि का होना बहुत ही आवश्यक है |  इसको हम प्रशासकीय भाषा कह सकते हैं जिसकी अपनी एक अलग पहचान होती है | इससे हम सबको सहमत होने की आवश्यकता है और इससे जुड़ना ही पड़ेगा क्योंकि इसका मकसद जीवन यापन से कहीं आगे है | यह निश्चित रूप से इसका असर हमारे साहित्य पर पड़ता है | हम हिंदी भाषा की बात करें तो यह हम सब का कर्तव्य बन जाता है कि हम सब हिंदी साहित्य की, विशेषता: व्याकरण क्षेत्र के लिए हम सभी अध्यापक और शिक्षाविदों का यह कर्तव्य बन जाता है कि हम इन नौनिहालों को एक सही रास्ता दिखाएँ | सही व्याकरण निष्ठ भाषा को सिखाएँ और यहाँ पर मैं कहना चाहूँगा कि भाषा की कोई जाति नहीं होती है | कोई जाति विशेष की भाषा नहीं होती है न ही किसी स्थान विशेष की भाषा होती है | जैसा कि मैंने आपको बताया था कि जो बोलचाल की भाषा होती है उसको हम भाषा न कहकर लोक भाषा कहते हैं | हमारे समाज में बोली जाने वाली भाषा से  हमें ऊपर उठकर सोचना है | हिंदी की कोई जाति नहीं है, यह सभी की भाषा है | इसका कोई वर्ग नहीं है, यह सभी वर्ग की भाषा है | अगर हम कहें संपूर्ण देश की भाषा है और संपूर्ण विश्व को मार्ग दिखाने वाली भाषा है तो यह कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी |

यदि हम आज देखें खास करके इस कोरोना काल में, तो हिंदी भाषा ने आज ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के ऊपर अपने आप को विकास के अवसर में बदल लिया है | हर जगह-जगह वेबिनार आयोजित किए जा रहे हैं | आज हिंदी को लेकर लोग काफी संजीदा हैं | निश्चित तौर पर यह जो समय है कहीं न कहीं मानव समाज के लिए तो एक चुनौती ही है | लेकिन उस चुनौती को अगर हम अवसर में बदलना चाहे तो हम देखते हैं कि, हिंदी भाषा को बढ़ाने के लिए हमें इससे अच्छा और मौका नहीं मिल सकता है | आज जहां हम एक प्लेटफार्म पर इंटरनेट के माध्यम से खड़े हैं और अनेक विभिन्न वर्गों, समितियों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के माध्यम से हम अनेक विभिन्न विचार गोष्ठियां आयोजित कर रहे हैं | उसमें तरह-तरह के विषय या प्रकरण के ऊपर हम चर्चा कर रहे हैं |  जिस तरीके से शोधार्थी,  अध्यापक तथा अन्य समाजसेवी लोग इससे जुड़ रहे हैं, और अपने विचार रख रहे हैं तथा दूसरों के विचार से अवगत होकर कुछ नया सीख रहे हैं | इससे निश्चित तौर पर मैं कहना चाहूंगा कि इससे हमारी हिंदी भाषा के सम्मान में विकास और वृद्धि हो रही है तथा हिंदी एक विश्वव्यापी भाषा के रूप में उभर कर सामने आ रही हैं | सारी दुनिया में आज हिंदी को  एकता की एक कड़ी के रूप में सम्मानित दर्जा प्राप्त हो रहा है | विश्व के अनेक देशों में हिंदी को सम्मान जनक भाषा के रूप में स्थान मिल रहा है | इस गरिमा पूर्ण अवसर के लिए बहार बसे भारतीय मूल के शिक्षाविदों और भारतीयों का सबसे बड़ा हाथ है |

उत्तर भारत की भाषा कह कर के हिंदी के राष्ट्रीय व्यक्तित्व को छोटा करना उचित नहीं है | यह सच है और इसे कोई नकार नहीं सकता कि, आज आहिंदी भाषी क्षेत्र के लोगों ने हिंदी को अपनाया है और उसी के कारण ही हिंदी ने यह स्थान प्राप्त किया है | आज मैं कहना चाहूंगा कि आहिंदी भाषी क्षेत्रों में जितना हिंदी का व्यापक रूप देखने को मिल रहा है, आज तक कभी देखने को नहीं मिला है |  इस कोरोना काल  में अगर हम देखें तो आहिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी को बहुत बड़ा सम्मान मिल रहा है | लोग बहुत कुछ सीखने के लिए तत्पर हैं और सीख रहे हैं |

हिंदी हिंदुओं की भाषा है और उर्दू मुसलमानों की जुबान है ऐसा कहकर भी हिंदी को बहुत आघात पहुँचाया गया है | यह अंग्रेजो तथा मुट्ठी भर अंग्रेजी परस्त लोगों की साजिश रही है | इस बारे में मैं कहना चाहूँगा कि ऐसा नहीं है कि हिंदी सिर्फ हिंदुओं की भाषा है, जी नहीं ऐसा कहना बिल्कुल सरासर गलत बात होगी | भाषा की कोई जाति, भाषा की बिरादरी नहीं होती है | खास करके उसे मजहब का रंग देना तो भारत की संस्कृति के साथ खिलवाड़ करना होगा या संस्कृति के साथ दगाबाजी करना होगा | जो लोग ऐसा कहते हैं मजहब के रंगीन चश्में से इसको देखते हैं वे सरासर देश के साथ और देश की संस्कृति के साथ अन्याय कर रहे होते हैं | एक बार फिर मैं कहना चाहूँगा कि भाषा की कोई जाति या बिरादरी नहीं होती है | भाषा को जीवंत बनाए रखने के लिए कहीं के भी शब्द को आने की इजाजत होनी चाहिए, यह मेरा अपना विचार है | शब्द अन्य भाषा  या फिर ग्रामीण लोक भाषा के भी हो सकते हैं | ऐसे में यहाँ पर हम सबका दायित्व बनता है कि हम उन्हें मार्गदर्शन दें न कि उन पर पाबंदी लगाई जाए | इस बात को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए की भाषा किसी प्रदेश विशेष की अमानत है | आँचलिक बोलियों को मातृभाषा का बड़प्पन दे करके हिंदी की स्थिति को कम करना है, जो कि ठीक नहीं है | मैं तो कहूँगा कि सहज और सरल स्वरूप अख्तियार करने का रास्ता खोजें तो बहुत अच्छी शुरुआत होगी | यदि मैं आहिंदी भाषी क्षेत्र दक्षिण भारत की बात करूँ  तो वहां पर लोग हिंदी भाषा को हृदय से अपना रहे हैं | इसे सीखने में दिन रात एक कर रहे हैं | मैंने अपनी आंखों से देखा है | मैं दक्षिण भारत में अध्यापन का कार्य करता हूँ, और मैंने बच्चों को देखा है इतनी सहजता के साथ हिंदी भाषा को सिर्फ सीखना पसंद ही नहीं करते हैं, बल्कि इसे दिन-प्रतिदिन की दिनचर्या में भी प्रयोग करते हैं | और यह हम सभी के लिए एक बहुत ही अच्छा संकेत है | मेरी राय में भाषा न तो सरल होती हैं और न ही कठिन होती है, इसकी अवधारणा है कि हम इसको कैसे समझते  हैं | हिंदी की कठिनाई का ढिंढोरा पीटने वाले लोग निश्चित तौर पर अपनी समझ की भाषा से ज्यादा प्यार करते हैं | यह मेरा अपना मानना है जैसा उर्दू के माहिर लोग हिंदी जुबान को मुश्किल भाषा कहते हैं और इसमें कठिनाई को दूर करने की बात करते हैं जबकि ऐसा नहीं है | फिर मैं कहना चाहूँगा कि कोई भी भाषा न सरल है और न कठिन, बस जरूरत है तो उसको समझने की | यदि हम बात करें हिंदी और अंग्रेजी की तो अंग्रेजी भाषा से निश्चित तौर पर हिंदी बहुत ही सरल और वैज्ञानिक भाषा है, इसमें अर्थ ह्रदय स्पर्शी होते हैं |

हिंदी को अपना रहे वर्तमान शासन तंत्र में अपनी एक नई पहचान बनाने के लिए हिंदी आगे उभर कर आ रही है और निश्चित तौर पर मैं कहना चाहूँगा कि वर्तमान शासन तंत्र में हिंदी अपनी एक नई पहचान बनाने में कामयाब हो रही है | आने वाले समय में कार्यालय में पत्राचार की भाषा के रूप में निश्चित तौर पर हिंदी लोकप्रिय होगी जिन्हें हिंदी के विकास प्रसार एवं प्रचार का ज्ञान नहीं है | वही हिंदी को सरलीकरण की बात करते हैं, और वह सिर्फ आदत से मजबूर हैं | यह सरकारी कार्यालयों में राजभाषा विभाग की कार्यप्रणाली पर कोई अगर ध्यान दें तो ऐसी बात नहीं मिलेगी हिंदी अब किसी कानून और कायदे की उँगली पकड़कर चलने की भाषा नहीं रह गई है, उँगली पकड़कर चलने की मोहताज नहीं रही है | धीरे-धीरे राष्ट्रीय चेतना उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक संपूर्ण भारत में व्याप्त हो रही है अगर हम कहें तो इस काल में सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर सम्पूर्ण विश्व में हिंदी ने अपना जो स्थान बनाया है पिछले 40 से 50 वर्षों में स्थान हिंदी को नहीं मिल सका है | निश्चित तौर पर मैं कहना चाहूँगा कि लोगों का मन बदल रहा है, विदेशी चीजों के चलते लोगों में जो विदेशी भाषा की ललक थी वह कम हो रही है और वहीं पर वह लोग हिंदी को ज्यादा सम्मान दे रहे हैं | बजाय इसके कहने को कि, हिंदी को सरल किया जाए वह हिंदी को अपना रहे हैं और निश्चित तौर पर हिंदी आगे विकास के क्षेत्र में सभी के लिए एक नया मार्ग खोलेगी और जिससे सिर्फ देश का ही नहीं बल्कि विश्व का कल्याण होगा | यही हमारी संस्कृति कहती है “सर्वे भवंतु सुखिन: सर्वे संतु निरामया” संपूर्ण मानव समाज का कल्याण हो संपूर्ण धरती पर रहने वाले लोगों का कल्याण हो यह हमारी सोच है | निश्चित तौर पर यह जो हमारी राजभाषा है इन सभी चीजों को आगे लाने में सक्षम होगी | आखिर में ढ़ेर सारी शुभकामनाओं के साथ एक बार फिर मैं आप सब को यह बताना चाहता हूँ कि भाषा निश्चित तौर पर लोक भाषा हो सकती है, ग्रामीण भाषा हो सकती है, बोल चाल की भाषा हो सकती हैं, लेकिन भाषा की कोई जाति नहीं होती है | भाषा की कोई बिरादरी नहीं होती है | भाषा तो सिर्फ और सिर्फ भाषा होती है, जो कि हमें अपने विचार को अगले किसी दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाने का एक साधन होती है | मैं आप सब को यह करता हूँ कि आप अपने मन और मस्तिष्क में यह रख लें कि कोई भी भाषा क्यों न हो, भाषा सिर्फ और सिर्फ भाषा होती है |

धन्यवाद |

डॉ. प्रो. के. के. शर्मा

     

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