मंगलवार, 16 दिसंबर 2025

अनुशासन को लेकर आम भ्रांतियाँ (ग़लत धारणाएँ)

 

अनुशासन को लेकर आम भ्रांतियाँ (ग़लत धारणाएँ)

भ्रांति 1: अनुशासन का अर्थ है कठोरता और दंड

सच्चाई: अनुशासन का मतलब केवल डाँटना, सज़ा देना या डराकर आदेश मनवाना नहीं है। यह एक सकारात्मक प्रक्रिया है जो व्यक्ति को आत्म-नियंत्रण और विवेकपूर्ण निर्णय लेने की प्रेरणा देती है।

उदाहरण: स्कूलों में जहाँ अनुशासन केवल सज़ा के रूप में लागू होता है, वहाँ छात्रों में भय का वातावरण बन जाता है। वहीं, जिन स्कूलों में अनुशासन को आत्म-नियंत्रण के रूप में सिखाया जाता है, वहाँ छात्र स्वयं प्रेरित होते हैं समय पर कार्य करने के लिए।

भ्रांति 2: अनुशासन से स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है

सच्चाई: अनुशासन स्वतंत्रता को सीमित नहीं करता, बल्कि उसे संरचित करता है। यह सिखाता है कि स्वतंत्रता का सदुपयोग कैसे किया जाए।

संदर्भ: महात्मा गांधी ने कहा था, "स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ है आत्म-नियंत्रण।" जब व्यक्ति अपने व्यवहार और समय पर नियंत्रण रखता है, तभी वह वास्तविक रूप से स्वतंत्र होता है।

भ्रांति 3: अनुशासन केवल बच्चों और छात्रों के लिए होता है

सच्चाई: अनुशासन जीवन भर की आवश्यकता है। हर उम्र में व्यक्ति को स्वयं को अनुशासित रखना चाहिए – चाहे वह एक विद्यार्थी हो, एक पेशेवर, एक माता-पिता, या एक नागरिक।

उदाहरण: एक नेता का जीवन जितना अधिक अनुशासित होता है, उसकी निर्णय-क्षमता और नेतृत्व उतना ही प्रभावशाली होता है।

 

भ्रांति 4: अनुशासित लोग रचनात्मक नहीं हो सकते

सच्चाई: रचनात्मकता और अनुशासन विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। अनुशासित दिनचर्या रचनात्मकता को विकसित करने के लिए समय और मनोबल देती है।

उदाहरण: प्रसिद्ध लेखक हरुकी मुराकामी प्रतिदिन एक ही समय पर उठते हैं, दौड़ते हैं, और लिखते हैं। उनका सृजनात्मक कार्य गहरे अनुशासन का उदाहरण है।

भ्रांति 5: अनुशासन बाहर से थोपा जाता है

सच्चाई: सच्चा अनुशासन अंदर से आता है – जब व्यक्ति अपने लक्ष्यों के प्रति प्रतिबद्ध होता है। बाहरी नियम केवल प्रारंभिक मार्गदर्शन होते हैं।

उदाहरण: एक खिलाड़ी को जबतक कोच अनुशासन में रखता है, वह अभ्यास करता है। लेकिन जब वह स्वयं उस अनुशासन को अपनाता है, तभी वह महान खिलाड़ी बनता है।

भ्रांति 6: अनुशासित जीवन नीरस होता है

सच्चाई: अनुशासन नीरसता नहीं लाता, बल्कि जीवन में स्थिरता, शांति और उत्पादकता लाता है। यह व्यक्ति को अपने लक्ष्य के करीब लाता है।

संदर्भ: जापानी जीवनशैली में अनुशासन और सादगी को महत्व दिया जाता है, और इसी कारण जापान में जीवन प्रत्याशा और उत्पादकता विश्व में सर्वोच्च है।

कुछ और भ्रांतियाँ

भ्रांति 1: अनुशासन सख्ती से आता है

वास्तविकता: अनुशासन सख्ती से नहीं, समझ और संवाद से आता है।

भ्रांति 2: डर ही अनुशासन बनाए रखता है

वास्तविकता: डर से स्थायी अनुशासन नहीं बनता; सम्मान और संबंध से बनता है।

भ्रांति 3: हर छात्र को एक ही तरीके से अनुशासित करना चाहिए

वास्तविकता: हर छात्र अलग होता है; वैयक्तिक दृष्टिकोण ज़रूरी है।

भ्रांति 4: अनुशासन दंड देने की प्रक्रिया है

वास्तविकता: अनुशासन दिशा देने की प्रक्रिया है, न कि दंड देने की।

(संक्षेप में):

  • अनुशासन एक मूल्य आधारित आचरण है, न कि नियंत्रणात्मक हथियार।
  • शिक्षकों को अनुशासन को डर नहीं, दिशा के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए।
  • अनुशासन की भ्रांतियों को दूर किए बिना, एक सकारात्मक और प्रेरणादायक शिक्षण वातावरण बनाना कठिन है।

निष्कर्ष : अनुशासन के विषय में व्याप्त भ्रांतियाँ केवल सीमित दृष्टिकोण का परिणाम हैं। यदि हम अनुशासन को आत्म-नियंत्रण, समय प्रबंधन और सकारात्मक आदतों के रूप में समझें, तो यह जीवन को अधिक सुसंगत और संतुलित बना सकता है। हमें ज़रूरत है अनुशासन के व्यापक और मानवीय दृष्टिकोण को अपनाने की।

 

सेना का अनुशासन कक्षा में: छात्रों के चरित्र निर्माण के प्रभावी तरीके


सेना का अनुशासन कक्षा में: छात्रों के चरित्र निर्माण के प्रभावी तरीके

 

प्रस्तावना : आज की शिक्षा केवल परीक्षा पास कराने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। छात्रों के चरित्र, अनुशासन और जीवन मूल्यों का निर्माण भी उतना ही आवश्यक है। भारतीय सेना में 17 वर्षों की सेवा और फिर शिक्षा क्षेत्र में कार्य करते हुए मैंने यह अनुभव किया है कि सेना का अनुशासन यदि कक्षा में सही ढंग से लागू किया जाए, तो छात्रों का सर्वांगीण विकास संभव है।

        यह अनुशासन डर पर नहीं, बल्कि कर्तव्य, आत्मनियंत्रण और जिम्मेदारी पर आधारित हो। सेना का अनुशासन केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक सशक्त पद्धति है। यदि कक्षा में सैन्य अनुशासन के मूल तत्वों को अपनाया जाए, तो छात्रों के व्यक्तित्व और चरित्र का सर्वांगीण विकास संभव है। नीचे मैं अपने अनुभव के आधार पर ऐसे पाँच प्रभावी तरीकों को बतलाने का प्रयास किया है जिनसे कक्षा में सेना-जैसा अनुशासन अपनाकर छात्रों का चरित्र निर्माण किया जा सकता है—

1. समयपालन और नियमितता : सेना में समय का अत्यधिक महत्व होता है। कक्षा में समय पर आना, कार्य समय पर पूरा करना और दिनचर्या का पालन करना छात्रों में जिम्मेदारी, आत्मनियंत्रण और कार्य के प्रति गंभीरता विकसित करता है।

2. कर्तव्यबोध और उत्तरदायित्व : सेना में अधिकार से पहले कर्तव्य सिखाया जाता है। छात्रों में भी यह भावना विकसित की जानी चाहिए कि- ‘पढ़ना उनका कर्तव्य और नियमों का पालन उनका दायित्व है।’ सैनिक अपने कर्तव्य को सर्वोपरि मानते हैं। कक्षा में छात्रों को छोटे-छोटे दायित्व (जैसे मॉनिटरशिप, समूह कार्य) सौंपने से उनमें कर्तव्यनिष्ठा, नेतृत्व और जवाबदेही का भाव उत्पन्न होता है।

3. अनुशासन और आत्मनियंत्रण : सेना का अनुशासन आत्मनियंत्रण सिखाता है। कक्षा में नियमों का पालन, शालीन व्यवहार और मर्यादा बनाए रखने से छात्रों में संयम, धैर्य और नैतिकता का विकास होता है।

4. टीमवर्क और सहयोग : सेना में सफलता टीमवर्क पर निर्भर करती है। समूह गतिविधियाँ, परियोजनाएँ और खेल छात्रों को सहयोग, पारस्परिक सम्मान और सामूहिक लक्ष्य के लिए काम करना सिखाते हैं।

5. देशभक्ति और नैतिक मूल्यों का विकास : सेना देशसेवा का प्रतीक है। कक्षा में देशभक्ति, ईमानदारी, साहस और त्याग जैसे मूल्यों पर चर्चा और गतिविधियाँ छात्रों में सकारात्मक सोच और उच्च नैतिक चरित्र का निर्माण करती हैं।

निष्कर्ष : कक्षा में सेना के अनुशासन के तत्वों को अपनाकर छात्रों को न केवल अनुशासित बनाया जा सकता है, बल्कि उन्हें जिम्मेदार, नैतिक और आत्मनिर्भर नागरिक भी बनाया जा सकता है। ऐसा चरित्र निर्माण ही राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य की नींव है।

 

शुक्रवार, 28 मार्च 2025

शाम -ए -ग़ज़ल 2025

                                                                          शाम -ए -ग़ज़ल 

25 फरवरी 2025 को क्राइस्ट विश्वविद्यालय बेंगलूरु (कर्नाटक) में 'शाम-ए-ग़ज़ल' कार्यक्रम आयोजित किया गया, जो संगीत प्रेमियों के लिए एक यादगार शाम साबित हुई। इस कार्यक्रम का उद्देश्य ग़ज़ल की समृद्ध परंपरा को सम्मानित करना और छात्रों एवं संगीत प्रेमियों को इस विधा से जोड़ना था।​

       क्राइस्ट यूनिवर्सिटी बेंगलूरू में हिंदी और उर्दू में रूचि रखने वाले विद्यार्थियों के क्लब (CHUP) ने 25 फरवरी 2025 की संध्या क्राइस्ट विश्वविद्यालय के मुख्य परिसर के मुख्य सभागार में वार्षिक कार्यक्रम “शाम-ए-गजल” का सफल आयोजन किया। जिसके विशिष्ट अथिति के तौर पर वर्तमान शेर-शायरी जगत के स्तंभ तथा माने जाने  कवि ‘अज़हर  इकबाल जी की उपस्थित रही |  

       इस कार्यक्रम के प्रणेता क्राइस्ट विश्वविद्यालय के भाषा विभाग में कार्यरत डॉ. सेबास्टियन के. ए., डॉ. के.के. शर्मा एवं डॉ. रेशमा एम्.एल के मार्गदर्शन में (CHUP) क्लब के पूर्वअध्यक्ष एवं छात्र रहे माननीय 'ज़ैद हैदरी' की देखरेख में वर्तमान क्लब अध्यक्ष श्री शार्थक एवं सुश्री अदिति सिंह के साथ उनकी पूरी टीम ‘मनसा-वाचा-कर्मणा’ लगभग पंद्रह दिनों से अथक परिश्रम करती रही जिसका प्रतिफल कार्यक्रम की गतिशीलता तथा उसकी उत्कृष्ता में साफ़ झलक रहा था |    

       कार्यक्रम के प्रारंभ से ही एक के बाद एक बाल कवि मंच पर आए कुछ ने गाया, कुछ ने अपनी शायरी का समा बाँधा तो कुछ ने अपनी कविताओं को जीवंत कर दिया। उर्दू और हिंदी भाषा जिन्हें समाज में अक्सर एक वर्ग विशेष धार्मिक विभाजन के प्रतीक के रूप में देखता है, वे भी इस जीवान्त कलाकारों की आवाज़ में सहजता से प्रवाहित होते चले गए |  इस अद्भुद अविस्मरणीय काव्यमय शाम की गूँज आज भी क्राइस्ट विश्वविद्यालय के गलियारों में बच्चों के मन-मंदिर पर छाप छोड़ते हुए समय-समय पर उन्हें गुनगुनाने पर मजबूर कर देती है | यही नही पूरे परिसर में इस कार्यक्रम की चर्चाए-आम हो गई है |

कार्यक्रम की मुख्य विशेषताएं:

  • प्रमुख कलाकार: कार्यक्रम में प्रसिद्ध ग़ज़ल गायक एवं कवि ‘अज़हर  इकबाल ने अपनी प्रस्तुति से सभी को मंत्रमुग्ध किया। उनकी सुरीली आवाज़ और भावपूर्ण गायकी ने श्रोताओं के दिलों को छू लिया।
  • छात्रों की भागीदारी: विश्वविद्यालय के भाषा विभाग के छात्रों ने अपनी प्रस्तुतियों से कार्यक्रम में रंग भरा। उनकी प्रस्तुति ने साबित किया कि नई पीढ़ी भी ग़ज़ल की परंपरा को जीवित रखने के लिए तत्पर है।
  • संगीत संयोजन: संगीत संयोजन में तबला, हारमोनियम और सितार जैसे वाद्य यंत्रों का उत्कृष्ट उपयोग किया गया, जिसने ग़ज़ल की महफिल को और भी जीवंत बना दिया।
  • श्रोताओं की प्रतिक्रिया: कार्यक्रम में लगभग बारह सौ के आसपास उपस्थित दर्शकों ने हर प्रस्तुति का तालियों की गड़गड़ाहट से स्वागत किया। कई श्रोताओं ने कहा कि यह कार्यक्रम उनकी आत्मा को सुकून देने वाला था और उन्होंने ग़ज़ल की गहराई को महसूस किया।
  • आयोजन स्थल की साज-सज्जा: कार्यक्रम स्थल को पारंपरिक अंदाज में सजाया गया था, जिससे एक प्राचीन ग़ज़ल महफिल का माहौल बना। दीपों की रोशनी और फूलों की सजावट ने वातावरण को और भी मोहक बना दिया।

निष्कर्ष: 'शाम-ए-ग़ज़ल' कार्यक्रम ने क्राइस्ट विश्वविद्यालय में संगीत और संस्कृति के प्रति प्रेम को एक नई दिशा दी। इस प्रकार के आयोजन न केवल छात्रों को सांस्कृतिक धरोहर से जोड़ते हैं, बल्कि उन्हें अपनी प्रतिभा को प्रदर्शित करने का मंच भी प्रदान करते हैं। आशा है कि भविष्य में भी ऐसे कार्यक्रम आयोजित होते रहेंगे, जो हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखें।

         नई पीढ़ी ने इस हिंदी-उर्दू संगम के साथ गंगा-जमुनई तहज़ीब का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए सम्पूर्ण समाज को उस समय एक संदेश देने का प्रयास किया है जब भाषा को राजनीति का मोहरा बनया जा रहा है | भारत की भाषाई विविधता का जश्न मनाने के बजाय, राजनीतिक नेता प्रतिस्पर्धात्मक एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में भाषा का गला  घोटने में तनिक गुरेज नहीं करते हैं | भाषा अपने आप में सामाजिक एंव मानवीयता का एक पुल है जिसे हर व्यक्ति अपनी जीविका को चलाने का माध्यम मानता है फिर वह चाहे गाँव का निरीह घिस्सूराम हो या फिर शहर का मिस्टर ऐलन।

                                                                                  डॉ. के. के. शर्मा (सहायक आचार्य)                                                                                                             क्राइस्ट विश्वविद्यालय, भाषा विभाग


सोमवार, 17 मार्च 2025

21वीं सदी के उपन्यासों में चित्रित राजनीति के कारण उत्पन्न विघटन

                   21वीं सदी के उपन्यासों में चित्रित राजनीति के

                                      कारण उत्पन्न विघटन

प्रस्तावना : वर्तमान युग राजनीति से प्रभावित युग है। समाज एवं जीवन के सभी क्षेत्र राजनीति और नेताओं से अछूते नहीं हैं। यह बड़ी अजीब बात है कि लोगों के सोच और उनके कर्म में कितना अंतर होता है। वहीँ यह बात भी सर्वमान्य है कि कर्म सोच का ही परिमार्जित रूप होता है। फिर इस दोहरे मानदंड का अर्थ क्या है? ऐसी कौन सी अवस्थाएं हैं जो लोगों को उनके उद्देश्य से भटका देतीं हैं, अंतरात्मा की आवाज़ को दबा देतीं हैं? इस बात को स्पष्ट करने के लिए मानव जीवन का एक सूक्ष्म विश्लेषण आवश्यक है। अब तक यह बात सर्वमान्य रही है की एक शक्ति है जो सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड को नियंत्रित एवम् संचालित करती है। उसे चाहे ईश्वर नाम दें या प्रकृति। यही बात पृथ्वी और इसपर उपस्थित सभी जीवधारियों पर भी लागू होती है। यद्यपि कि हमारे अन्वेषण का केंद्र बिंदु मानव जीवन और उसकी प्रवृत्ति है तथापि एक नियम या प्रवृत्ति समस्त जीवधारियों में सामान है और वह है अपने अस्तित्व को बनाए रखने की प्रवृत्ति। मनुष्य पृथ्वी पर उपस्थित सभी प्राणियों में श्रेष्ठ है और इस श्रेष्ठता का मूल है प्रकृति प्रदत्त मानव मस्तिष्क की शक्ति, उसकी कल्पनाशीलता दूरदर्शिता, विचारशीलता, आकलन संवेदना आदि। इन्ही गुणों के बल पर मानव ने अन्य जीवों पर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध किया है। लेकिन अगर प्रकृति ने मनुष्य को इन विशेष गुणों से परिपूर्ण बनाया है तो इसके पीछे अवश्य ही कोई निश्चित उद्द्येश्य होगा। ग्रामीणों का राजनीति करण हमारे देश में सदा से ही होता चला आया है लेकिन आजकल जो कुछ किसानों को लेकर संसद से सड़क तक देखने को मिला रहा है वह किसी से छिपा हुआ नहीं हैं |        

शब्द कुंजिका : राजनीति, आधुनिकीकरण, औधोगिकीकरण, किसान-शोषण, बाज़ारवाद, सरकारी नीतियाँ |

शोध विधि : यह शोध-पत्र पूर्णतया नवीनता से युक्त विभिन्न स्रोतों तथा अधिकारिक वेबसाइट पर आधारित है | इस शोध-प्रपत्र में हिंदी उपन्यासों में निहित राजनीति के कारण उत्पन्न विघटन को आधुनिक विकासमय वातावरण में जीवन और समस्यओं को समेलित एवं चिन्हित कर उन्हें प्रकाश में लाने का एक प्रयास किया गया है |

शोध-विस्तार : राजनीति का अर्थ राज्य की नीति से है- वह नीति जिसके अनुसार राजा अपने राज्य का शासन तथा प्रजा की रक्षा करता है। जनता के सुरक्षा की आवश्यकता के लिए एक शासन तंत्र की आवश्यकता होती है। यह शासन तंत्र राजनीति के अन्तर्गत ही आता है।

        राजनीति बहुत पुराने समय से मनुष्य जीवन का एक अभिन्न अंग रही है जिसे मानव जीवन में अपनी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के कारण प्रत्येक काल के मानव ने स्वयं से जुड़ा हुआ पाया है, मनुष्य पर इसका प्रभाव लगातार बढ़ता ही जा रहा है। राजनीति विभिन्न स्तरों पर समाज को तथा हर व्यक्ति के जीवन को किसी न किसी रूप में प्रभावित करती  ही रहती है। समाज में यदि किसी नई चेतना का प्रकट होती है तो इसमें राजनीतिक का प्रभाव अवश्य ही देखा जा सकता है। राजनीति का समाज पर इतना ज्यादा असर होता है कि मानव का व्यवहार इससे आजाद या अलग नहीं रह पाता। इसी तरफ ध्यान दिलाते हुए रोम्यां रोला जी लिखते हैं, जो कोई मानव-समाज के लिए युद्ध चाहता है, उसे राजनीतिक क्षेत्र में युद्ध करना चाहिए, पर अपने मस्तिष्क की स्वाधीनता को किसी भी हालत में नहीं छोड़ना चाहिए। क्योंकि मानसिक स्वाधीनता ही उसे युद्ध क्षेत्र में हावी बनाए रखेगी

        बीसवीं सदी के अंतिम दशक का राजनीतिक परिवेश अस्थिरता एवं भ्रष्टाचार की दृष्टि से सबसे ज्यादा प्रभावित रहा है। इक्कीसवीं सदी की आरंभ में वाजपेयी जी प्रधानमंत्री थे। देश की विकास गति बढ़ा देने में उनका योगदान है। अनेक दलों की मिली-जुली सरकार को वाजपेयी जी ने बड़े अच्छे ढंग से चलाया। इसके बाद भारतीय राजनीति में प्रांतीय एवं प्रादेशिक पक्ष की संख्या लगातार बढ़ती गई।

        मानक हिन्दी कोश में राजनीति के दो अर्थों को अभिव्यक्त किया गया है- "एक वह नीति या पद्धति विशेष जिसके अनुसार किसी राज्य का प्रशासन किया जाता है या होता है। दूसरी गुटों, वर्गों आंदि की पारस्परिक स्पर्धावाली स्वार्थ पूर्ण नीति।" इससे स्पष्ट होता है कि एक सुरक्षा की प्रवृत्ति के अन्तर्गत बनाई जाने वाली आदेशात्मक नीति होती है और दूसरी अंहकार के कारण सत्ता के नशे में चूर विकृत राजनीति होती है, जो शोषण का रूप धारण कर लेती है। इसका उत्तम उदहारण ‘अकाल में उत्सव’ उपन्यास में देखेने को मिलता है “हर छोटा किसान किसी न किसी का कर्जदार है, बैंक का सोसाइटी का, बिजली विभाग का या सरकार का।”[1]

       गुटबाजी और षड्यंत्रों का अर्थ राजनीति नहीं होता। राजनीति के नाम पर इस प्रकार की भ्रष्ट व्यवस्था के प्रति विद्रोह और आक्रोश की नीति संभव है। स्वस्थ राजनीति शोषितों की पक्षघर होती है ताकि अन्याय और असमानता का विरोध किया जा सके और जनता को उसके अधिकारों के प्रति जागृत होने की दिशा दी जा सके।"[2] इक्कीसवीं सदी में प्रवेश की राजनीति चेतना भ्रष्ट राजनीति का पूरी तरह से विरोध करती है उसके प्रति विरोध और विद्रोह के प्रखर स्वरों को मुखर करती हुई कुछ भी कर गुजने के बिलकुल तैयार ही दिखाई देती है। आम लोग जो राजनीति से सीधे तौर पर प्रभावित होते है। वे भी उन नेताओं के कारण दलों में विभाजित हो जाते है क्योंकि राजनीति ही उनका आश्रय और शरणस्थली बन चुकी है। ऐसा करने पर ही नेता कुछ भीं कर सकते हैं। शोषितों के प्रति सहानूभूति को उनकी मर्म-चेतना पूरी तरह से बतलाती है। नेताओं को पूरे दिल से राजनीति करनी चाहिए। यही उनका पेशा है, और इसके लिए निष्ठावान रहना उनका कर्तव्य है। इस कथन का कारण आज के नेताओं की राजनीति और नैतिकता को सामान्यतः हानिकारक और स्वार्थपरक माना जाता है। लेकिन राजनीतिक वर्ग में राजनीति के साथ वैधता को लेकर बड़ा द्वंद चलता रहता है। ऐसा माना जाता है कि एक नेता को पूरे मन से राजनीति को अपना कर्तव्य मानकर करना चाहिए। लेकिन जहाँ नैतिकता और राजनीतिक दांवपेंचों के बीच भेद करने का अवसर आता है, वहाँ समस्या खड़ी हो जाती है। क्या इसका अर्थ यह समझा जाए कि राजनीति में नैतिकता की कोई गुंजाइश नहीं है? सिर्फ जीत ही मायने रखते है वह होनी चाहिए चाहे जैसे जीत के बाद नेताओं का छिपा स्वार्थ निकलकर सामने आता है जिसके कई उदहारण हमें हिंदी उपन्यासों में देखने को मिल जाते हैं |

       देश के प्रशासनिक अधिकारियों की अंग्रेजी मानसिकता अंग्रेजों के देश छोड़ के चले जाने के 70 वर्ष बाद भी किस प्रकार से सिस्टम का अंग बना हुआ है और वह सिस्टम यहाँ के गरीब, किसान और निम्न वर्ग के लोगों का दिन-रात शोषण कर रहा है। “कलेक्टर नाम के इस प्राणी को अंग्रेजों ने बहुत फुर्सत में बनाया था। सारी कूटनीति घोलकर डाल दी थी उसमें।”[3] यहाँ पर यदि हम देखें तो पाते हैं कि गरीब, कमजोर या असहाय का शोषण करने में कोई भी पीछे नहीं है चाहे राजनेता हो या फिर सरकारी अधिकारी बस कमी है तो अवसर की मौका पाते ही सब का असली चेहरा सामने आ जाता है। "राजनीतिक उपन्यासों के स्वतन्त्र अस्तित्व को मानने से आलोचक तथा इतिहासकार हिचकते रहे हैं। जिसके फलस्वरूप राजनीतिक उपन्यास की परिभाषा अभी तक निर्धारित नहीं हो सकी है। साहित्यकार तथा आलोचकों ने राजनीतिक उपन्यासों को कभी समाजवादी उपन्यास के रूप में देखा तो समय सरगम उपन्यास में कृष्णा सोबती जी ने आरक्षण की राजनीति रूपी तबे पर नेताओं की सिकती रोटी को समाज के सम्मुख उजागर करने के प्रयास से जिसमें एक संदर्भ में संवैधानिक आरक्षण के प्रति हेय नजरिए की अभिव्यक्ति हुई, और इस आरक्षण के विरुद्ध शिकायत मानो किसी संसार नियंता प्रभु तक पहुंचाई जा रही है, यह मान कर कि धरती पर के प्रभुवर्ग इस आरक्षण को हटाने से रहे। वे लिखती है कि- “स्वर्ग की सभी निधियां आपने मृत्युलोक की ओर प्रवाहित कर दी हैं। क्या आप हमें अनुसूचित जातियों का-सा आरक्षण कार्ड दे रहे हैं? प्रभुवर, ऐसा न कीजिए। हमें क्या आपकी संसद के बाहर धरना देना पड़ेगा!”[4]


निष्कर्ष : आज यदि हम समाज में देखें तो हर वर्ग आम जनता का ही फायदा उठाना चाहता है | गाँव की राजनीति से लेकर देश कि राजनीति तक हर जगह ही आम जनता को मोहरा बनाया जाता है यदि मैं ऐसा कहूँ तो कुछ गलत नहीं होगा | आम जनता का राजनीति करण हमारे देश में सदा से ही होता चला आया है लेकिन आजकल जो कुछ किसानों को लेकर संसद से सड़क तक देखने को मिला रहा है वह किसी से छिपा हुआ नहीं हैं | लोकतांत्रिक व्यवस्था की विसंगतियों तथा नेताओं की अदूरदर्शिता एवं भ्रष्टाचार की भरपाई, गरीब जनता को करनी पडती है। पुलिस और नेताओं की मिली भगत, सरकारी अफसरों की चाटुकारिता और सत्ता पक्ष में रहने वाले वर्ग का गरीब जनता के प्रति उदासीनता के भाव ने समाज की दशा और दिशा को प्रभावित किया है। जनता में असुरक्षा की भावना के कारण उनके जीवन में संघर्ष और नीरसता का भाव भर देता है। राजनीति का आधार देश में व्यवस्था को मजबूत करना है । सत्ताधारी वर्ग बहुमत की राजनीति द्वारा शक्ति को प्राप्त करता है । शासन पक्ष-विपक्ष में बँटकर नैतिकता को भूल जाता है। आज की राजनीति में खलनायक ही राजनायक बन सकते है ।

 

संदर्भ ग्रंथ :-

1.   पंकज सुबीर,      अकाल में उत्सव,                          पृष्ठ संख्या – 11

2.   समय सरगरम,    कृष्णा सोबती,                            पृष्ठ संख्या -112

3.   डॉ. संजीव,        अमृतलाल नागर के उपन्यासों में युग चेतना,       पृष्ठ संख्या – 91



[1] पंकज सुबीर,           अकाल में उत्सव,                             पृष्ठ संख्या – 11

[2] डॉ. संजीव            अमृतलाल नागर के उपन्यासों में युग चेतना,         पृष्ठ संख्या – 91

[3] पंकज सुबीर,      अकाल में उत्सव,  पृष्ठ संख्या – 174

[4] समय सरगरम,    कृष्णा सोबती,    पृष्ठ संख्या -112

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