सोमवार, 29 दिसंबर 2025

21वीं सदी के उपन्यासों में चित्रित राजनीति के कारण उत्पन्न विघटन

 

21वीं सदी के उपन्यासों में चित्रित राजनीति के कारण उत्पन्न विघटन

 

प्रस्तावना : वर्तमान युग राजनीति से प्रभावित युग है। समाज एवं जीवन के सभी क्षेत्र राजनीति और नेताओं से अछूते नहीं हैं। यह बड़ी अजीब बात है कि लोगों के सोच और उनके कर्म में कितना अंतर होता है। वहीँ यह बात भी सर्वमान्य है कि कर्म सोच का ही परिमार्जित रूप होता है। फिर इस दोहरे मानदंड का अर्थ क्या है? ऐसी कौन सी अवस्थाएं हैं जो लोगों को उनके उद्देश्य से भटका देतीं हैं, अंतरात्मा की आवाज़ को दबा देतीं हैं? इस बात को स्पष्ट करने के लिए मानव जीवन का एक सूक्ष्म विश्लेषण आवश्यक है। अब तक यह बात सर्वमान्य रही है की एक शक्ति है जो सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड को नियंत्रित एवम् संचालित करती है। उसे चाहे ईश्वर नाम दें या प्रकृति। यही बात पृथ्वी और इसपर उपस्थित सभी जीवधारियों पर भी लागू होती है। यद्यपि कि हमारे अन्वेषण का केंद्र बिंदु मानव जीवन और उसकी प्रवृत्ति है तथापि एक नियम या प्रवृत्ति समस्त जीवधारियों में सामान है और वह है अपने अस्तित्व को बनाए रखने की प्रवृत्ति। मनुष्य पृथ्वी पर उपस्थित सभी प्राणियों में श्रेष्ठ है और इस श्रेष्ठता का मूल है प्रकृति प्रदत्त मानव मस्तिष्क की शक्ति, उसकी कल्पनाशीलता दूरदर्शिता, विचारशीलता, आकलन संवेदना आदि। इन्ही गुणों के बल पर मानव ने अन्य जीवों पर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध किया है। लेकिन अगर प्रकृति ने मनुष्य को इन विशेष गुणों से परिपूर्ण बनाया है तो इसके पीछे अवश्य ही कोई निश्चित उद्द्येश्य होगा।

   ग्रामीणों का राजनीति करण हमारे देश में सदा से ही होता चला आया है लेकिन आजकल जो कुछ किसानों को लेकर संसद से सड़क तक देखने को मिला रहा है वह किसी से छिपा हुआ नहीं हैं |        

शब्द कुंजिका : राजनीति, आधुनिकीकरण, औधोगिकीकरण, किसान-शोषण, बाज़ारवाद, सरकारी नीतियाँ |

शोध विधि : यह शोध-पत्र पूर्णतया नवीनता से युक्त विभिन्न स्रोतों तथा अधिकारिक वेबसाइट पर आधारित है | इस शोध-प्रपत्र में हिंदी उपन्यासों में निहित राजनीति के कारण उत्पन्न विघटन को आधुनिक विकासमय वातावरण में जीवन और समस्यओं को समेलित एवं चिन्हित कर उन्हें प्रकाश में लाने का एक प्रयास किया गया है |

शोध-विस्तार : राजनीति का अर्थ राज्य की नीति से है- वह नीति जिसके अनुसार राजा अपने राज्य का शासन तथा प्रजा की रक्षा करता है। जनता के सुरक्षा की आवश्यकता के लिए एक शासन तंत्र की आवश्यकता होती है। यह शासन तंत्र राजनीति के अन्तर्गत ही आता है।

        राजनीति बहुत पुराने समय से मनुष्य जीवन का एक अभिन्न अंग रही है जिसे मानव जीवन में अपनी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के कारण प्रत्येक काल के मानव ने स्वयं से जुड़ा हुआ पाया है, मनुष्य पर इसका प्रभाव लगातार बढ़ता ही जा रहा है। राजनीति विभिन्न स्तरों पर समाज को तथा हर व्यक्ति के जीवन को किसी न किसी रूप में प्रभावित करती  ही रहती है। समाज में यदि किसी नई चेतना का प्रकट होती है तो इसमें राजनीतिक का प्रभाव अवश्य ही देखा जा सकता है। राजनीति का समाज पर इतना ज्यादा असर होता है कि मानव का व्यवहार इससे आजाद या अलग नहीं रह पाता।

 इसी तरफ ध्यान दिलाते हुए रोम्यां रोला जी लिखते हैं, जो कोई मानव-समाज के लिए युद्ध चाहता है, उसे राजनीतिक क्षेत्र में युद्ध करना चाहिए, पर अपने मस्तिष्क की स्वाधीनता को किसी भी हालत में नहीं छोड़ना चाहिए। क्योंकि मानसिक स्वाधीनता ही उसे युद्ध क्षेत्र में हावी बनाए रखेगी

        बीसवीं सदी के अंतिम दशक का राजनीतिक परिवेश अस्थिरता एवं भ्रष्टाचार की दृष्टि से सबसे ज्यादा प्रभावित रहा है। इक्कीसवीं सदी की आरंभ में वाजपेयी जी प्रधानमंत्री थे। देश की विकास गति बढ़ा देने में उनका योगदान है। अनेक दलों की मिली-जुली सरकार को वाजपेयी जी ने बड़े अच्छे ढंग से चलाया। इसके बाद भारतीय राजनीति में प्रांतीय एवं प्रादेशिक पक्ष की संख्या लगातार बढ़ती गई।

        मानक हिन्दी कोश में राजनीति के दो अर्थों को अभिव्यक्त किया गया है- "एक वह नीति या पद्धति विशेष जिसके अनुसार किसी राज्य का प्रशासन किया जाता है या होता है। दूसरी गुटों, वर्गों आंदि की पारस्परिक स्पर्धावाली स्वार्थ पूर्ण नीति।" इससे स्पष्ट होता है कि एक सुरक्षा की प्रवृत्ति के अन्तर्गत बनाई जाने वाली आदेशात्मक नीति होती है और दूसरी अंहकार के कारण सत्ता के नशे में चूर विकृत राजनीति होती है, जो शोषण का रूप धारण कर लेती है। इसका उत्तम उदहारण ‘अकाल में उत्सव’ उपन्यास में देखेने को मिलता है “हर छोटा किसान किसी न किसी का कर्जदार है, बैंक का सोसाइटी का, बिजली विभाग का या सरकार का।”

       गुटबाजी और षड्यंत्रों का अर्थ राजनीति नहीं होता। राजनीति के नाम पर इस प्रकार की भ्रष्ट व्यवस्था के प्रति विद्रोह और आक्रोश की नीति संभव है। स्वस्थ राजनीति शोषितों की पक्षघर होती है ताकि अन्याय और असमानता का विरोध किया जा सके और जनता को उसके अधिकारों के प्रति जागृत होने की दिशा दी जा सके।"

       इक्कीसवीं सदी में प्रवेश की राजनीति चेतना भ्रष्ट राजनीति का पूरी तरह से विरोध करती है उसके प्रति विरोध और विद्रोह के प्रखर स्वरों को मुखर करती हुई कुछ भी कर गुजने के बिलकुल तैयार ही दिखाई देती है। आम लोग जो राजनीति से सीधे तौर पर प्रभावित होते है। वे भी उन नेताओं के कारण दलों में विभाजित हो जाते है क्योंकि राजनीति ही उनका आश्रय और शरणस्थली बन चुकी है। ऐसा करने पर ही नेता कुछ भीं कर सकते हैं। शोषितों के प्रति सहानूभूति को उनकी मर्म-चेतना पूरी तरह से बतलाती है। नेताओं को पूरे दिल से राजनीति करनी चाहिए। यही उनका पेशा है, और इसके लिए निष्ठावान रहना उनका कर्तव्य है। इस कथन का कारण आज के नेताओं की राजनीति और नैतिकता को सामान्यतः हानिकारक और स्वार्थपरक माना जाता है। लेकिन राजनीतिक वर्ग में राजनीति के साथ वैधता को लेकर बड़ा द्वंद चलता रहता है। ऐसा माना जाता है कि एक नेता को पूरे मन से राजनीति को अपना कर्तव्य मानकर करना चाहिए। लेकिन जहाँ नैतिकता और राजनीतिक दांवपेंचों के बीच भेद करने का अवसर आता है, वहाँ समस्या खड़ी हो जाती है। क्या इसका अर्थ यह समझा जाए कि राजनीति में नैतिकता की कोई गुंजाइश नहीं है? सिर्फ जीत ही मायने रखते है वह होनी चाहिए चाहे जैसे जीत के बाद नेताओं का छिपा स्वार्थ निकलकर सामने आता है जिसके कई उदहारण हमें हिंदी उपन्यासों में देखने को मिल जाते हैं |

        देश के प्रशासनिक अधिकारियों की अंग्रेजी मानसिकता अंग्रेजों के देश छोड़ के चले जाने के 70 वर्ष बाद भी किस प्रकार से सिस्टम का अंग बना हुआ है और वह सिस्टम यहाँ के गरीब, किसान और निम्न वर्ग के लोगों का दिन-रात शोषण कर रहा है। “कलेक्टर नाम के इस प्राणी को अंग्रेजों ने बहुत फुर्सत में बनाया था। सारी कूटनीति घोलकर डाल दी थी उसमें।” यहाँ पर यदि हम देखें तो पाते हैं कि गरीब, कमजोर या असहाय का शोषण करने में कोई भी पीछे नहीं है चाहे राजनेता हो या फिर सरकारी अधिकारी बस कमी है तो अवसर की मौका पाते ही सब का असली चेहरा सामने आ जाता है। "राजनीतिक उपन्यासों के स्वतन्त्र अस्तित्व को मानने से आलोचक तथा इतिहासकार हिचकते रहे हैं। जिसके फलस्वरूप राजनीतिक उपन्यास की परिभाषा अभी तक निर्धारित नहीं हो सकी है। साहित्यकार तथा आलोचकों ने राजनीतिक उपन्यासों को कभी समाजवादी उपन्यास के रूप में देखा तो समय सरगम उपन्यास में कृष्णा सोबती जी ने आरक्षण की राजनीति रूपी तबे पर नेताओं की सिकती रोटी को समाज के सम्मुख उजागर करने के प्रयास से जिसमें एक संदर्भ में संवैधानिक आरक्षण के प्रति हेय नजरिए की अभिव्यक्ति हुई, और इस आरक्षण के विरुद्ध शिकायत मानो किसी संसार नियंता प्रभु तक पहुंचाई जा रही है, यह मान कर कि धरती पर के प्रभुवर्ग इस आरक्षण को हटाने से रहे। वे लिखती है कि- “स्वर्ग की सभी निधियां आपने मृत्युलोक की ओर प्रवाहित कर दी हैं। क्या आप हमें अनुसूचित जातियों का-सा आरक्षण कार्ड दे रहे हैं? प्रभुवर, ऐसा न कीजिए। हमें क्या आपकी संसद के बाहर धरना देना पड़ेगा!”

             निष्कर्ष : आज यदि हम समाज में देखें तो हर वर्ग आम जनता का ही फायदा उठाना चाहता है | गाँव की राजनीति से लेकर देश कि राजनीति तक हर जगह ही आम जनता को मोहरा बनाया जाता है यदि मैं ऐसा कहूँ तो कुछ गलत नहीं होगा | आम जनता का राजनीति करण हमारे देश में सदा से ही होता चला आया है लेकिन आजकल जो कुछ किसानों को लेकर संसद से सड़क तक देखने को मिला रहा है वह किसी से छिपा हुआ नहीं हैं | लोकतांत्रिक व्यवस्था की विसंगतियों तथा नेताओं की अदूरदर्शिता एवं भ्रष्टाचार की भरपाई, गरीब जनता को करनी पडती है। पुलिस और नेताओं की मिली भगत, सरकारी अफसरों की चाटुकारिता और सत्ता पक्ष में रहने वाले वर्ग का गरीब जनता के प्रति उदासीनता के भाव ने समाज की दशा और दिशा को प्रभावित किया है। जनता में असुरक्षा की भावना के कारण उनके जीवन में संघर्ष और नीरसता का भाव भर देता है। राजनीति का आधार देश में व्यवस्था को मजबूत करना    है । सत्ताधारी वर्ग बहुमत की राजनीति द्वारा शक्ति को प्राप्त करता है । शासन पक्ष-विपक्ष में बँटकर नैतिकता को भूल जाता है। आज की राजनीति में खलनायक ही राजनायक बन सकते है ।

 संदर्भ ग्रंथ :-

1.   पंकज सुबीर, अकाल में उत्सव, पृष्ठ संख्या – 11

2.   समय सरगरम, कृष्णा सोबती, पृष्ठ संख्या -112

3.   डॉ. संजीव, अमृतलाल नागर के उपन्यासों में युग चेतना, पृष्ठ संख्या – 91



                                                                                    

सोमवार, 22 दिसंबर 2025

जैनेन्द्र की कहानियों में झलकता मनोविज्ञान

 जैनेन्द्र की कहानियों में झलकता मनोविज्ञान

प्रस्तावना : जैनेन्द्र कुमार का जन्म 2 जनवरी, 1905 में जिला अलीगढ़ के कौड़ियागंज नामक स्थान में हुआ था | इनके पिता का नाम श्री प्यारेलाल और माता का नाम श्रीमती रामदेवी था | जैनेन्द्र जी के जन्म के 2 वर्ष बाद ही इनके पिता की मृत्यु हो गई | इनकी माता एवं मामा ने इनका पालन-पोषण किया | जैनेन्द्र कुमार की अधिकांश कहानियाँ बाल-मनोविज्ञान पर आधारित है, जिनमें अनन्तर, इनाम, पाजेब, आत्म-शिक्षण, फोटोग्राफी, खेल, किसका रुपया, चोर, अपना-अपना भाग्य, तमाशा, दिल्ली में, जनता में, दो चिडियाँ, पढाई, राज-पथिक, अपना-पराया, बिल्ली-बच्चा और रामू की दादी नाम से है, ...

शोध विवरण : जैनेन्द्र जी की कहानियों में मनोवैज्ञानिक प्रभाव देखने को मिलते हैं | जैसे ‘पाजेब’ कहानी में आशुतोष द्वारा पाजेब की चोरी नहीं करने पर भी पिता के दबाव व भय के कारण चोरी को स्वीकार कर लेता है, वही पिता जब अपनी बात आशुतोष से मनवा लेते हैं तो उन्हें अत्यन्त हर्ष की अनुभूति होती है, वह कहते हैं-‘‘मैंने अत्यन्त हर्ष के साथ दोनों बाँहों में लेकर उसे उठा लिया। उल्लासपूर्वक बोला कि देखो हमारे बेटे ने सच कबूल किया है । इसी तरह से अनेक कहानियों के माध्यम से इस शोध-प्रपत्र में मैंने उनकी कहनियों में मनोविज्ञान को प्रकाश में लाने का प्रयास किया है | इस कार्य के लिए उनकी अनेक कहानियों को इस शोध-प्रपत्र में स्थान दिया गया है | आशा ही नहीं विश्वास है आप सभी का प्यार और स्नेह मिलेगा |

 जैनेन्द्र जी की कहानियों में से पाजेब कहानी को देखे तो  उसने आशुतोष द्वारा पाजेब की चोरी नहीं करने पर भी पिता के दबाव व भय के कारण चोरी को स्वीकार कर लेता है | बालक आशुतोष के मन में पिता को पाजेब के चोरी की कृति देने पर द्वन्द्व उत्पन्न होता है, कि पाजेब मैंने तो छुन्नु को नहीं दी तो वह कहां से देगा। जब पिता द्वारा चाचा को यह आदेश दिया गया कि आशु के साथ जाकर छुन्नु से पाजेब ले आओ तो आशुतोष कहता है-‘‘मैंने आग्रह किया तो वह बोला कि छुन्नु के पास नहीं हुई तो वह कहां से देगा।’’ जिस दबाव व भय के कारण आशुतोष पाजेब की चोरी को स्वीकारता है उसी दबाव व भय के कारण छुन्नु भी झूठ बोलता है। माँ से पिटने के बाद छुन्नु कहता है- ‘‘पाजेब आशुतोष के हाथ में मैंने देखी थी और वह पतंग वाले को दे आया है। मैंने खूब देखी थी, वह चाँदी की थी।’’अभिभावकों का बच्चों पर दबाव डालना, उससे अपनी बात मनवाना व बच्चों का डर में चोरी और झूठ को स्वीकार करना आदि मनोवैज्ञानिक बातें हैं, जो जैनेन्द्र की पाजेब कहानी में देखने को मिलती है।

      जैनेन्द्र जी की दूसरी एक कहनी ‘खेल’ में जैनेन्द्र जी ने बालमनोविज्ञान का चित्रण किया है। इसमें बाल मनोवैज्ञानिक कहानियों में प्रमुख तत्वों जैसे-उत्सुकता, स्पर्धा, द्वन्द्व, आत्म-प्रदर्शन, अनुकरण आदि का सफल चित्रण हुआ है।’’ जैनेन्द्र की ‘खेल’ कहानी के बारे में यह कहा जाता है कि यह जैनेन्द्र की पहली कहानी है जो ‘विशाल-भारत’ पत्रिका से प्रकाशित हुई थी। जैनेन्द्र ने इसे खेल-खेल में ही लिख दिया था, अपने आस-पास का जो यथार्थ जैसा देखा उसका वर्णन ‘खेल’ कहानी के रूप में वैसा कर दिया।‘‘मनोवैज्ञानिक तत्वों के प्रस्तुतीकरण के लिए जैनेन्द्र जी ने अपनी कहानियों में पात्रों की मनोदशा को स्पष्ट करने के लिए प्रवाहपूर्ण भाषा को अपनाया है। प्रवाहात्मकता, आलंकारिकता, चित्रात्मकता, प्रतीकात्मकता, व्यंग्यात्मकता, नाटकीयता तथा भावनात्मकता आदि गुणों के दर्शन जैनेन्द्र जी की कहानियों में मिले हैं।’’जैनेन्द्र की ‘खेल’ कहानी में सुर्रो रानी व मनोहर की बाल-क्रीडा का बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति की है। दोनों का आपस में लडना-झगडना व कुछ समय मनाने में लगाना बाद में मान जाना बालकों में जो स्वाभाविक अभिवृत्ति होती है उसे बहुत ही रोचकता से दर्शाया है। जब वे दोनों साथ होते हैं तो दुनियादारी को भूल जाते हैं और अपनी क्रीडा में लगे  रहते हैं-‘‘बालक और बालिका अपने को और सारे विश्व को भूल, गंगातट के बालू और पानी को अपना एक मात्र आत्मीय बना, उनसे खिलवाड कर रहे थे।’’सुरबाला जब अपना भाड बडी मुश्किलों, मिन्नतों व सोच-समझ कर तैयार कर लेती है फिर वह उस मिट्टी से अपने पैर को इस प्रकार धीरे-धीरे हटाती है कि लगता है कि वह जो एक बच्ची है उसमें नारीत्व और मातृत्व का रूप दिखाई देता है-‘‘माँ जिस सतर्क सावधानी के साथ अपने नवजात शिशु को बिछौने पर लेटाने को छोडती है, वैसे ही सुरबाला ने अपना पैर धीरे-धीरे भाड के नीचे से खींच लिया।’’जब मनोहर द्वारा सुर्रो का भाड तोड दिया जाता है तब बाल स्वभाव के कारण सुर्रो रूठ जाती है, लेखक सुर्रो को मनोहर द्वारा यह समझाने का प्रयास करते हैं, कि चाहे मिट्टी का भाड हो, शरीर या यह संसार एक दिन समाप्त होना ही है हमें उससे शिक्षा लेनी चाहिए-‘‘यह संसार क्षणभंगुर है। इसमें दुःख क्या और सुख क्या। जो जिससे बनाया है वह उसी में लय हो जाता है-इसमें शोक और उद्वेग की क्या बात है? यह संसार जल का बुदबुदा है, फुटकर किसी रोज जल में ही मिल जाएगा।’’ मनोहर द्वारा सुर्रो का व सुर्रो द्वारा मनोहर का भाड तोडना व अन्त में जोर-जोर से हँसना व इस हँसी का साक्षी सूर्य व गंगातट बनाना है।

       जैनेन्द्र जी की ‘चोर’ कहानी पूरी बालक प्रद्युम की मनःस्थिति को दर्शाती है। वह बडों की बातें सुन-सुन कर अपने मन में चोर की छवि एक राक्षस के रूप में मान लेता है और उसी भय, डर व जिज्ञासा के कारण वह पूरी रात सो नहीं पाता है। उसके मन में चोर को जानने व देखने की जिज्ञासा बनी रहती है, वहीं दूसरी ओर माँ परेशान हो जाती है कि प्रद्युम जो एक शरारती बच्चा है जिसमें कुछ दिनों से हलचलें नहीं दिखाई दे रही है और ना ही वह सो पा रहा है। माँ कहती है-‘‘वह मेरे अंक में लगकर सोने की चेष्टा करने लगा। मैं थोडी-थोडी देर में उसके पपोटे देखती थी कि सो तो गया है न? मैंने कहा क्यों प्रद्युम* नींद नहीं आती? क्या बात है। कुछ देर साँस बाँधकर वह लेटा रहा। अंत में वह रोक नहीं सका, एकाएक बोला, ‘‘भाभी,चोर कैसा होता है?’’ कहानी के अंतिम पडाव में प्रद्युम की जिज्ञासा का खुलासा होता है जिस बाल मनोस्थिति के कारण वह चोर को राक्षस समझता है उसे एक दिन पुलिस द्वारा ले जाते हुए देखता है तब उसकी जिज्ञासा का अंत होता है कि चोर तो आम व्यक्ति ही है, वह हम में से ही होता है, वह राक्षस नहीं होता है। जिज्ञासा की पूर्ति होने पर वह अत्यंत प्रसन्न होता है, और माँ से कहता है-‘‘सहसा बीच में वह बोला, चोर आदमी होता है, माँ? चोर नहीं होता? मैंने कहा, ‘‘हाँ बेटा, आदमी ही होता है। राक्षस नहीं होता।’’

    जैनेन्द्र की कहानियों में पति-पत्नी और वह’ का त्रिकोण है तो कुछ में स्त्री-पुरूष के आपसी रिश्तों से उपजी नारी मन की झुंझलाहट। ‘पत्नी‘ (1940) और ‘त्रिवेणी‘(1935) दोनों कहानियाँ लगभग एक जैसी नारी की कथाएं है। ‘पत्नी‘ की पत्नी सुनन्दा अपने पति कालिन्दी चरण की सेवा ‘भारतीय नारी-विधान‘ की तरह ही करती है। लेकिन उसे अपने जीवन के दिनों में अलस भाव से केवल यही सोचने को रह गया है कि (जिन्दगी के) कोयले बुझ न जाये। वह जिनकी अर्धांगिनी है उसी का उत्साह उसे समझ में नही आता। परतंत्रता (सदियों की) की बेड़ियों में जकड़ी इस नारी को (सुनन्दा को) भारत माता की स्वतंत्रता की बात समझ में नही आती है। ‘वह कम पढ़ी-लिखी है, लेकिन उसमे उसका क्या कसूर है? कहकर जैनेन्द्र पूरी सामाजिक व्यवस्था को कटघरे मे खड़ा करते है। घर मे ही बेगानी बन गई नारी की कहानी है- ‘पत्नी‘। किसी ने सही लिखा है-‘‘सुनन्दा का पति परदेश मे नही है, वह घर पर ही है। वह चौकेकी वेबा है, र्निजीव चीजों के बीच ही सुनन्दा की दुनिया बसती है। उसकी ट्रेजडी मे कोई काव्यत्व नही, नाटकीयता नही, नित्य प्रति का मौन मरण है। जहाँदुख एक दिन का नही रोज का है। ध्यान रहे! यह अज्ञेय का ‘रोज‘ नही है। यहाँ अज्ञेय के नीरस, यान्त्रिक विघटनोन्मुख जीवन का रूप नही है- यह तो जैनेन्द्र का अपनी परंपरा मे दो दम्पत्तियों के अनबन की कहानी है, जिसमे चाह और खीझ दोनों दबायी जाती है। खीझ तो कभी प्रकट हो जाती है, लेकिन तब असल चाह पर परदा पड़ जाता है। एक ओर उपेक्षा लेकिन दूसरी ओर मनुहार की भूख है।‘‘ यहाँ जैनेन्द्र यह दिखाने मे सफल है कि ‘क्रान्ति‘ घर के बाहर ही होती थी, यह भी चित्रित करने मे सफल है कि नारी मुक्ति का आन्दोलन घर के भीतर नही चल रहा था। वह मात्र छलावा था, नारी अब भी पिंछड़े मे बंद थी। वे यह भी बताते चलते है आन्दोलन का जिम्मा किस तरह घर के भीतर कैद रहने वाली नारियां उठ रही थी। इस कहानी मे नारी अपने ‘तनिक-सा‘ मान की तलाश करती है यहाँ वह भी कुचल उठा। लेकिन फिर भी सुनन्दा-‘मेरी तो खैर कुछ नही, पर अपने तन का ध्यान रखना चाहिए।‘ की कामना अपने पति से करती है। इस कहानी मे-बच्चो की तरह झगड़ा है, मगर बड़ों की तरह विचार, पति के स्वास्थ्य की चिन्ता है, पति कुछ भी करे, उसमे विश्वास भी है, पति कम से कम पूछॅ तो लिया करे बस इतनी सी ही ललक है। जैनेन्द्र के नारी पात्र उनके इसी वक्तव्य पर साइन कर अपने को पुरूष समाज के शोषण से मुक्त कर पाने में असफल रहती है।

   अत्यधिक नैतिकता वैवाहिक जीवन मे एक स्त्री को कुंठित कर देती है। छः बच्चों की माँ बन चुकी स्त्री उजाले मे पति को ‘सत्यार्थ-प्रकाश‘ के रूप में ही क्यों देखती है। पति का प्यार उसने दिन मे देखा ही नहीं। स्त्री अपने पति को प्रेम के रूप मे देखना चाहती है लेकिन उसने उपदेशक और कामुक के अतिरिक्त कोई और अवस्था देखी ही नही। ‘क्या है स्त्री, क्या है अर्थ, क्या है व्यवसाय ? जैनेन्द्र की नारी को यह सब माया का प्रपंच लगता है।तमाम कष्टों को सहकर अपने पति को इन कष्टों की फिक्र से दूर रखने की कोशिश यहाँ भी है घर से बाहर बिना बताये निकलने की मनाई भी है साथ मे है पुरूष वादी मानसिकता का वह बंधन जिसके लिए नारी सिर्फ नारी है। इस प्रकार ‘दो सहेलियाँ‘ जैनेन्द्र की नारी जीवन को बेढ़ब जिन्दगी को उजागर करने वाली ऐसी कहानी है जिसमे संवेदनाओ, को मोथरा बना दिया है समाज ने और उसकी झूठी नैतिकता ने !जैनेन्द्र की नारी जिस तरह ‘त्यागपत्र‘ में समाज को नहीं तोड़ती, वैसे ‘दों सहेलियाँ‘ में भी। वैसे भी जैनेन्द्र तोड़ने के नही जोड़ने के हमेशा कायल रहे है बावजूद कुछ कमजोरियो के। ‘‘उनकी रचनाओं में जिस रास्ते से समाज परिवर्तन की ध्वनि उठती है, वह हृदय-परिवर्तन का रास्ता है। त्याग उनके पात्रों का सबसे बड़ा गुण है, वे दूसरे को तकलीफ पहुचाना तो दूर होम होना जानते हैं-बलिदान, उत्सर्ग की भावना उस समय वातावरण मे थी। ‘‘इसलिए कोई उन पर गाधीवाद का प्रभाव देखना चाहे तो देख सकता है |” 

       लेखक का मानना है कि पुरुष अपने भाग्य से तभी जुड़ता है, जब वह अपने अहं को त्याग देता है। लेखक के अनुसार, अकर्म का आशय सही अर्थों में निम्न स्तर का कर्म है। अकर्म का अर्थ ‘कर्म नहीं’ से नहीं लेना चाहिए। इसे ‘कर्म के अभाव’ से न जोड़ते हुए कर्तव्य के क्षय यानी कर्त्तव्य की स्थिति में पतन, किए जाने वाले कर्म में गिरावट, उसमें क्षय या पतन से सम्बन्धित माना है। वास्तव में व्यक्ति के अन्दर मौजूद अहं भाव ही इस अकर्म के लिए उत्तरदायी होता है। अतः आवश्यक है कि व्यक्ति अपने अहं को समाप्त करे, जिससे उसके कर्त्तव्य के स्तर में सकारात्मक परिवर्तन आए ।

निष्कर्ष : ज्यों-ज्यों मानव विज्ञान के क्षेत्र में नए-नए प्रयोग करता जा रहा है और उसे उस प्रयोग में सफलता मिलती जा रही है त्यों-त्यों उसका संसार बड़ा होता जा रहा है | साहित्य और दर्शन के क्षेत्र में यह विस्तार और नवीनता बहुमुखी और व्यापक हैं | मनोविज्ञान में मानसिक भावों का कार्य कारण के साथ अध्ययन किया जाता है | व्यक्ति के विचार और भाव कैसे बनते हैं, कैसे जाग्रत  होते हैं, क्रियाओं को कैसे प्रभावित करते हैं, उनके मित्र और शत्रु रूप कौन-कौन होते हैं तथा जीवन में कितना गंभीर प्रभाव बनता है, इन सभी तत्वों का मनोविज्ञान और मनोविश्लेषण के द्वारा अध्ययन किया जाता है | व्यक्ति का अदृश्य या परोक्ष व्यक्तित्व उसके दृश्य या प्रत्यक्ष व्यक्तित्व से कई गुना बढ़ा सबल और सक्रिय होता है | अपनी कहानियों में जैनेंद्र ने इसी मनोविज्ञान को आधार बनाया है और चरित्रों के परोक्ष व्यक्तित्व को नाना प्रकार से विश्लेषण किया है |


भाषाई चुनौतियाँ और समाधान

                                                                                              भाषाई चुनौतियाँ और समाधान   भाषा मानव जीवन का ...