21वीं सदी के उपन्यासों में चित्रित राजनीति के कारण उत्पन्न विघटन
प्रस्तावना : वर्तमान
युग राजनीति से प्रभावित युग है। समाज एवं जीवन के सभी क्षेत्र राजनीति और नेताओं
से अछूते नहीं हैं। यह बड़ी अजीब बात है कि लोगों के सोच और उनके कर्म में कितना
अंतर होता है। वहीँ यह बात भी सर्वमान्य है कि कर्म सोच का ही परिमार्जित रूप होता
है। फिर इस दोहरे मानदंड का अर्थ क्या है? ऐसी कौन सी अवस्थाएं हैं जो
लोगों को उनके उद्देश्य से भटका देतीं हैं, अंतरात्मा की आवाज़ को दबा
देतीं हैं? इस बात को स्पष्ट करने के लिए
मानव जीवन का एक सूक्ष्म विश्लेषण आवश्यक है। अब तक यह बात सर्वमान्य रही है की एक
शक्ति है जो सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड को नियंत्रित एवम् संचालित करती है। उसे चाहे
ईश्वर नाम दें या प्रकृति। यही बात पृथ्वी और इसपर उपस्थित सभी जीवधारियों पर भी
लागू होती है। यद्यपि कि हमारे अन्वेषण का केंद्र बिंदु मानव जीवन और उसकी
प्रवृत्ति है तथापि एक नियम या प्रवृत्ति समस्त जीवधारियों में सामान है और वह है
अपने अस्तित्व को बनाए रखने की प्रवृत्ति। मनुष्य पृथ्वी पर उपस्थित सभी प्राणियों
में श्रेष्ठ है और इस श्रेष्ठता का मूल है प्रकृति प्रदत्त मानव मस्तिष्क की शक्ति, उसकी कल्पनाशीलता दूरदर्शिता, विचारशीलता, आकलन संवेदना आदि। इन्ही
गुणों के बल पर मानव ने अन्य जीवों पर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध किया है। लेकिन अगर
प्रकृति ने मनुष्य को इन विशेष गुणों से परिपूर्ण बनाया है तो इसके पीछे अवश्य ही
कोई निश्चित उद्द्येश्य होगा।
ग्रामीणों का राजनीति करण हमारे देश में सदा
से ही होता चला आया है लेकिन आजकल जो कुछ किसानों को लेकर संसद से सड़क तक देखने को
मिला रहा है वह किसी से छिपा हुआ नहीं हैं |
शब्द कुंजिका : राजनीति, आधुनिकीकरण,
औधोगिकीकरण, किसान-शोषण, बाज़ारवाद, सरकारी नीतियाँ |
शोध विधि : यह शोध-पत्र पूर्णतया नवीनता
से युक्त विभिन्न स्रोतों तथा अधिकारिक वेबसाइट पर आधारित है | इस शोध-प्रपत्र में
हिंदी उपन्यासों में निहित राजनीति
के कारण उत्पन्न विघटन को आधुनिक विकासमय वातावरण में
जीवन और समस्यओं को समेलित एवं चिन्हित कर उन्हें प्रकाश में लाने का एक प्रयास
किया गया है |
शोध-विस्तार : राजनीति का अर्थ राज्य की
नीति से है- वह नीति जिसके अनुसार राजा अपने राज्य का शासन तथा प्रजा की रक्षा
करता है। जनता के सुरक्षा की आवश्यकता के लिए एक शासन तंत्र की आवश्यकता होती है।
यह शासन तंत्र राजनीति के अन्तर्गत ही आता है।
राजनीति बहुत पुराने समय से मनुष्य जीवन का एक
अभिन्न अंग रही है जिसे मानव जीवन में अपनी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के कारण
प्रत्येक काल के मानव ने स्वयं से जुड़ा हुआ पाया है, मनुष्य पर इसका प्रभाव लगातार
बढ़ता ही जा रहा है। राजनीति विभिन्न स्तरों पर समाज को तथा हर व्यक्ति के जीवन को
किसी न किसी रूप में प्रभावित करती ही
रहती है। समाज में यदि किसी नई चेतना का प्रकट होती है तो इसमें राजनीतिक का
प्रभाव अवश्य ही देखा जा सकता है। राजनीति का समाज पर इतना ज्यादा असर होता है कि
मानव का व्यवहार इससे आजाद या अलग नहीं रह पाता।
बीसवीं सदी के अंतिम दशक का
राजनीतिक परिवेश अस्थिरता एवं भ्रष्टाचार की दृष्टि से सबसे ज्यादा प्रभावित रहा
है। इक्कीसवीं सदी की आरंभ में वाजपेयी जी प्रधानमंत्री थे। देश की विकास गति बढ़ा
देने में उनका योगदान है। अनेक दलों की मिली-जुली सरकार को वाजपेयी जी ने बड़े
अच्छे ढंग से चलाया। इसके बाद भारतीय राजनीति में प्रांतीय एवं प्रादेशिक पक्ष की संख्या
लगातार बढ़ती गई।
मानक हिन्दी कोश में राजनीति के दो अर्थों को अभिव्यक्त किया गया है- "एक वह नीति या पद्धति विशेष जिसके अनुसार किसी राज्य का प्रशासन किया जाता है या होता है। दूसरी गुटों, वर्गों आंदि की पारस्परिक स्पर्धावाली स्वार्थ पूर्ण नीति।" इससे स्पष्ट होता है कि एक सुरक्षा की प्रवृत्ति के अन्तर्गत बनाई जाने वाली आदेशात्मक नीति होती है और दूसरी अंहकार के कारण सत्ता के नशे में चूर विकृत राजनीति होती है, जो शोषण का रूप धारण कर लेती है। इसका उत्तम उदहारण ‘अकाल में उत्सव’ उपन्यास में देखेने को मिलता है “हर छोटा किसान किसी न किसी का कर्जदार है, बैंक का सोसाइटी का, बिजली विभाग का या सरकार का।”
गुटबाजी और षड्यंत्रों का अर्थ राजनीति नहीं होता। राजनीति के नाम पर इस प्रकार की भ्रष्ट व्यवस्था के प्रति विद्रोह और आक्रोश की नीति संभव है। स्वस्थ राजनीति शोषितों की पक्षघर होती है ताकि अन्याय और असमानता का विरोध किया जा सके और जनता को उसके अधिकारों के प्रति जागृत होने की दिशा दी जा सके।"
इक्कीसवीं सदी में प्रवेश की राजनीति चेतना भ्रष्ट राजनीति का पूरी तरह से विरोध
करती है उसके प्रति विरोध और विद्रोह के प्रखर स्वरों को मुखर करती हुई कुछ भी कर
गुजने के बिलकुल तैयार ही दिखाई देती है। आम लोग जो राजनीति से सीधे तौर पर
प्रभावित होते है। वे भी उन नेताओं के कारण दलों में विभाजित हो जाते है क्योंकि राजनीति
ही उनका आश्रय और शरणस्थली बन चुकी है। ऐसा करने पर ही नेता कुछ भीं कर सकते हैं। शोषितों
के प्रति सहानूभूति को उनकी मर्म-चेतना पूरी तरह से बतलाती है। नेताओं
को पूरे दिल से राजनीति करनी चाहिए। यही उनका पेशा है, और
इसके लिए निष्ठावान रहना उनका कर्तव्य है। इस कथन का कारण आज के नेताओं की राजनीति
और नैतिकता को सामान्यतः हानिकारक और स्वार्थपरक माना जाता है। लेकिन राजनीतिक
वर्ग में राजनीति के साथ वैधता को लेकर बड़ा द्वंद चलता रहता है। ऐसा माना जाता है
कि एक नेता को पूरे मन से राजनीति को अपना कर्तव्य मानकर करना चाहिए। लेकिन जहाँ
नैतिकता और राजनीतिक दांवपेंचों के बीच भेद करने का अवसर आता है, वहाँ
समस्या खड़ी हो जाती है। क्या इसका अर्थ यह समझा जाए कि राजनीति में नैतिकता की कोई
गुंजाइश नहीं है?
सिर्फ जीत ही मायने रखते है वह होनी चाहिए चाहे जैसे जीत के बाद नेताओं का छिपा
स्वार्थ निकलकर सामने आता है जिसके कई उदहारण हमें हिंदी उपन्यासों में देखने को
मिल जाते हैं |
निष्कर्ष : आज यदि हम समाज में देखें तो
हर वर्ग आम जनता का ही फायदा उठाना चाहता है | गाँव की राजनीति से लेकर देश कि
राजनीति तक हर जगह ही आम जनता को मोहरा बनाया जाता है यदि मैं ऐसा कहूँ तो कुछ गलत
नहीं होगा | आम जनता का राजनीति करण हमारे देश में सदा से ही होता चला आया है
लेकिन आजकल जो कुछ किसानों को लेकर संसद से सड़क तक देखने को मिला रहा है वह किसी
से छिपा हुआ नहीं हैं | लोकतांत्रिक व्यवस्था की विसंगतियों तथा नेताओं की
अदूरदर्शिता एवं भ्रष्टाचार की भरपाई, गरीब जनता को करनी पडती है।
पुलिस और नेताओं की मिली भगत, सरकारी अफसरों की चाटुकारिता
और सत्ता पक्ष में रहने वाले वर्ग का गरीब जनता के प्रति उदासीनता के भाव ने समाज
की दशा और दिशा को प्रभावित किया है। जनता में असुरक्षा की भावना के कारण उनके
जीवन में संघर्ष और नीरसता का भाव भर देता है। राजनीति का आधार देश में व्यवस्था
को मजबूत करना है । सत्ताधारी वर्ग
बहुमत की राजनीति द्वारा शक्ति को प्राप्त करता है । शासन पक्ष-विपक्ष में बँटकर
नैतिकता को भूल जाता है। आज की राजनीति में खलनायक ही राजनायक बन सकते है ।
1. पंकज सुबीर, अकाल में उत्सव, पृष्ठ संख्या – 11
2. समय सरगरम, कृष्णा सोबती, पृष्ठ संख्या -112
3. डॉ. संजीव, अमृतलाल नागर के
उपन्यासों में युग चेतना, पृष्ठ संख्या – 91
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें