शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2025

वेदना मन की

 

वेदना मन की


तेरी यादों की छाँव में, मैं हर पल खो जाती हूँ,

बिन तेरे सूनी रातों में, अश्रु बहाते सो जाती हूँ।

बिछड़ गए जो राहों में, फिर न मिल सके दोबारा,
साँसें हैं इस जीवन में, पर जीवन लगता हारा-हारा।

चाँद भी अब तो मुझसे रूठा, तारे भी चुपचाप हुए,
पवन जो मन को भाती थी, अब वही मलय संताप हुए ।

तेरी बातों की गूँज अब भी, तन-मन में लहराती है,
तेरी छुअन की यादें मुझको, रातों-रात तड़पाती है।

सूनी चौखट, सूनी अँखियाँ, मन है सूना, सूना है संसार,
तेरे बिना ये जीवन मेरा, ज्यों सूखा सावन पालनहार।

तेरी आहट, तेरी छाया, दिल के हर कोने में बसती है,
कैसे तुझे बताऊँ बिन तेरे, मन की दुनिया ही धँसती है।

पथ की हर कली मुरझाई, हर लय में छाई उदासी है,
मेरे जीवन की हर धड़कन, अब तेरी विरह की दासी है।

फिर भी इंतजार में तेरी, प्रेम जोत जलाए बैठी हूँ
साँसों के डुबते सागर में, बस तेरी आस लगाए बैठी हूँ |

विरहणी

 

विरहणी

                            प्रिय तेरी राह थी तकती, काटी रातें तारे गिन-गिन |

शब्दों का तुम जाल बनाकर, छल करते थे निश-दिन ||

साँसे-साँसे चलती थी, तुम बिन खाना-पीना भूल गई |

विरह ताप में जल-जलकर, यह काया मेरी सूख गई ||

बन निर्मोही तू चला गया, बिन तुम मैं कैसे जीती थी ?

कभी मिलो तो तुम्हे बताऊँ,पल-पल कैसे घड़ियाँ बीती थी||

जीवन का ताप बना तप मेरा, नयनों में फिर झरी लगी |

वषों बाद पिया मिलन होगा, जब मुझको यह खबर लगी  ||

अब नई कहानी फिर न गढ़ना, मैं सत्य उसे न मानूँगी |

हठ समझो या अधिकार मेरा, इस बार  चले बिना न मानूँगी ||

छाया बन मैं साथ तुम्हारे, हर संकट से लड़ जाऊँगी |

बात कहोगे अपनी बीती, अविरल ही सुनती जाऊँगी ||

जो चाहो तो अजमा लो, हर बात तुम्हारी ही मानूँगी |

सर्वस्व तुम्हीं को सौंप चुकी, विरह न तुमसे चाहूँगी ||

‘सुमित’ सरित बन मन भर दो, और नहीं कुछ माँगूगी|

हठ समझो या अधिकार मेरा, इस बार  चले बिना न मानूँगी ||

शाम -ए -ग़ज़ल 2025

                                                                          शाम -ए -ग़ज़ल  25 फरवरी 2025 को क्राइस्ट विश्वविद्यालय बेंगलूरु (कर...