शुक्रवार, 27 दिसंबर 2024

मेरी मुन्नार यात्रा

 

मेरी मुन्नार यात्रा

पर्यटन मनुष्य को सीखने और समझने तथा अपने अनुभवों को सकारात्मक रूप से जीवन में बहुत कुछ संजोने का मौका देता है | मैंने सेना में रहते हुए भारत के पूर्व, उत्तर और पश्चिम की अनेक यात्राएँ की थी हालांकि यह यात्राएँ सभी मेरे स्थानांतरण संबंधित थी लेकिन इन सभी जगहों को उनके प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ सामाजिक वातावरण एवं वहाँ के रहन-सहन तथा रीति-रिवाज और उनके पहनावे, खानपान आदि को भी बड़ी निकटता से परखा था | परंतु दक्षिण भारत में केरल राज्य के मुन्नार  नामक स्थान का भ्रमण करने का मौका मुझे सेना से अवकाश प्राप्त होने के उपरांत क्राइस्ट स्कूल बेंगलुरु में अध्यापन कार्य करने के दौरान सत्र २०१७-१८ में प्राप्त हुआ | विद्यालय प्रत्येक वर्ष अपने अध्यापकों को शैक्षिक-भ्रमण पर ले जाता है | इसी क्रम में उस वर्ष भ्रमण के लिए विद्यालय प्राचार्य फादर अगस्टियन पी. के साथ ६५ अध्यापक-अध्यापिकाओं का समूह बेंगलुरु से मुन्नार(केरल) के लिए गया था | 09 फरवरी 2018 का दिन था विद्यालय में भ्रमण के लिए जाने वाले अध्यापकों को दोपहर 12:15 पर विद्यालय से मुक्त कर दिया गया था क्योंकि दोपहर 2:30 पर विद्यालय परिसर से दो बसों के माध्यम से अध्यापकों को बेंगलुरु सिटी रेलवे स्टेशन पहुँचना था सभी अध्यापक-अध्यापिकाएँ समय से पूर्व सिटी रेलवे स्टेशन पहुँच गए थे | मैं विद्यालय बस में न जाकर घर से ऑटो लेकर के एन.सी.सी. ऑफिस का कुछ काम करते हुए रेलवे स्टेशन पहुँचा था | ठीक 8:00 बजे शाम को ट्रेन नंबर 6350 बेंगलुरु से अलुवा के लिए रवाना हुई | रास्ते में थॉमस सर और श्री नागेश कुमार जी की देखरेख में संपूर्ण व्यवस्था खाने पीने की थी | समय-समय पर सभी को भोजन पानी और चाय मिलता रहा | ट्रेन दूसरे दिन सुबह 4:15 पर अलुवा स्टेशन पर पहुँची|  हम सभी उतर गए हालांकि ट्रेन का सही समय 3:50 था थोड़ा विलंबित थी | स्टेशन से हम सब दो बसों के द्वारा सी.एम.आई.(क्रिश्चियन संस्था) के एक विद्यालय में करीब 6:30 बजे प्रातःकाल पहुँचे वह विद्यालय बड़े ही रमणीय स्थान पर मानों प्राकृति ने उसे अपने हाथों से सजाया था वहाँ हम सब के तैयार होने तथा सुबह का नाश्ता करने का इंतजाम था |  हम सभी लोग तैयार होकर सुबह का नाश्ता करने के बाद पुन: अपनी-अपनी बसों में आकर बैठ गए हमारी बसें वहाँ से टेढ़े-मेंढ़े रास्तों, जंगलों और चाय के बागानों से होते हुए अनेक सुंदर-सुंदर जलप्रपातों को देखते हुए एक बहुत ही सुंदर रमणीय जलप्रपात(अथुकड़) पर पहुँचे वह बहुत ही मनोहारी था | थोड़ी देर रुकने के बाद वहाँ से हमारी बस मुन्नार के लिए रवाना हुई | दोपहर करीब 12:30 के आसपास हम मुन्नार बसस्टैंड पहुँच गए | वहीँ पास ही ‘मुन्नार डे’ नामक होटल में “विद्यालय यात्रा व्यवस्थापक समिति” ने पहले से ही कमरे बुक करा रखे थे | हम सब होटल पहुँचकर दोपहर का भोजन किए उसके बाद अपने-अपने कमरों में चले गए | थोड़ी देर आराम करने के बाद लगभग 05 बजे  शाम को हम सभी स्थानीय बाजार घूमने गए | बाजार पहाड़ियों से घिरा था, बाजार में अनेक आकर्षक वस्तुएँ थी जिनमें स्थानीय चॉकलेट, चाय और हाथों से बने अनेक सामानों से पूरा बाजार सजा था | मुझे सबसे ज्यादा धार्मिक एकता को एक सूत्र में पिरोने वाली बात पसंद आई, वह यह थी कि मुन्नार  बाजार की पीछे की ओर थोड़ी दूर पर, थोड़ी ऊँचाई पर एक तरफ बहुत पुरानी चर्च वहीं से थोड़ा आगे दक्षिण की ओर मस्जिद और मस्जिद के बाएँ और लगभग 300 मीटर की दूरी पर भव्य शंकर जी का मंदिर था | मंदिर तक जाने के लिए बाजार के बीच से एक छोटे से पुल को पार करके पहुँचा जा सकता था | मैंने अपने मित्र के साथ चर्च, मंदिर और मस्जिद की रमणीयता को बारी-बारी से देखा तदुपरांत बाजार भ्रमण करके हम लोग वापस होटल आ गए | थोड़ा विश्राम के बाद हम सब तैयार होकर रात्रि भोज पर गए और स्थानीय व्यंजनों का रसास्वादन कर होटल के बहार यूँ ही टहलने निकल गए | हवा ठंडी थी, पहाड़ियों पर बने होटलों के मद्धिम प्रकाश और आकाश में टिमटिमा रहे तारे ऐसे प्रतीत हो रहे थे की मानों आपस में मिल जाने को आतुर हो रहे हों | थोड़ी देर में ठंड बढ़ने लगी तो हम वापस कमरे में आ कर सो गए | दूसरे दिन प्रातः नाश्ते के बाद हम सभी लोग मुन्नार के प्रसिद्ध ‘चाय संग्रहालय’ गए वहां पर हम लोगों को मुन्नार की डॉक्यूमेंट्री देखने का मौका मिला | जिससे मुन्नार के पुराने इतिहास से आज तक के स्वरूप का पता चला, डॉक्यूमेंट्री के दौरान ही मुन्नार में आई प्राकृतिक आपदाओं के बारे में भी जानकारी मिली | चाय के संग्रहालय के बाद हम सभी गुलाब के बगीचे फिर हाथी पार्क तथा उसके बाद प्रसिद्ध बाँध और झील (कुंडाला) देखने गए | यहीं पर दोपहर के भोजन की व्यवस्था थी भोजन के उपरांत कुछ लोग वोटिंग करने चले गए कुछ लोग वहाँ के स्थानीय बाजार में घूमने चले गए | तकरीबन शाम 4:30 बजे के आसपास हम वहाँ से सी.एम.आई. के द्वारा संचालित विद्यालय के लिए रवाना हुए और करीब 1 घंटे के बाद हम सब विद्यालय परिसर में पहुँच गए | वहाँ पर चॉकलेट फैक्ट्री, फल के बागान और दुकानें थी वहाँ पर सभी लोग अपनी अपनी पसंद की चीजें खरीदें और चॉकलेट फैक्ट्री में चॉकलेट बनते हुए देखे | शाम को विद्यालय परिसर में बने चर्च में प्रार्थना सभा का आयोजन था प्रार्थना के उपरांत विद्यालय के खेल के मैदान में एक स्थान पर रात्रि भोज और कैम्प फायर का प्रबंध किया गया था | सभी लोग समय से एकत्र हो गए जलती हुई आग  के चारों ओर कुर्सियाँ रखी गई थी सभी लोग अपना अपना स्थान ग्रहण कर चुके थे | हमारे विद्यालय के प्रिंसिपल फादर अगस्टियन पी. को बुलाकर के खेल प्रारंभ करने के लिए कहा सभी लोग ने अनेक खेल खेले गाने आदि गाकर लुफ्त उठाया | उसके बाद रात्रि भोज करके रात्रि करीब 10:00 बजे के आसपास हम सभी मुन्नार डे होटल वापस आ गए | तीसरे दिन सुबह 6:45 पर सभी लोग तैयार होकर बस के द्वारा मुन्नार से कोचीन के लिए रवाना हो, गए रास्ते में लगभग 1 घंटे यात्रा के बाद एक सुंदर स्थान पर नाश्ते का प्रबंध था सभी ने नाश्ता किया और थोड़ा आराम कर के बस में सभी आकर बैठ गए | लगभग एक से डेढ़ घंटे चलने के बाद रास्ते में एक बहुत बड़ी दुकान के पास कॉफी पीने के लिए लगभग 20 से 30 मिनट रुकने के बाद हम सब फिर चल पड़े | दोपहर के पहले ही हम सब कोचीन शहर पहुँच गए वहाँ समुद्र तट के निकट ही एक बहुत सुंदर होटल में दोपहर का भोजन करने की व्यवस्था की गई थी | दोपहर भोज के उपरांत हम सब समुद्र को देखने गए वहाँ से प्रसिद्ध और पुरानी कोच्ची चर्च पहुँचे | वहाँ पर हम सभी को महान दार्शनिक वास्कोडिगामा के डूम को देखने का मौका मिला जो चर्च के अंदर ही था | कोचीन में गर्मी बढ़ चुकी थी वहाँ से देवी मंदिर और दो-तीन जगह का भ्रमण करने के बाद हम सभी लोग समुद्र के तट पर बोटिंग करने के लिए आ गए | लगभग एक से डेढ़ घंटे तक बोट में हम लोगों ने बिताए | बोट में पथ प्रदर्शक हम सब को नौसेना की बोट, मालवाहक बोट, समुद्र में डॉल्फिन प्वाइंट आदि बता-बताकर दिखा रहा था | एक बार तो हमारी बोट काफी अंदर समुद्र में चली गई थी वहाँ से थोड़ी दूर पर है अरब सागर की सीमा प्रारंभ होती थी | ऐसा मार्गदर्शक ने बताया | वहाँ से आते समय भारतीय नौसेना तटरक्षक ने आगे जाने से मना कर दिया | हम लोग वापस आ गए, वापस तट के पास आने पर हम लोग बगल के एक होटल में चाय और कॉफी पीने के लिए गए जिसका जो मन आया किसी ने चाय का रसास्वादन किया तो किसी ने काफी पी | थोड़ी देर रुक करके नाश्ता करने के बाद सूरज डूबने का हम लोग इंतजार करने लगे वह समय बड़ा ही रमणीय था जिस समय सूरज अरेबियन सागर में डूबा था वह आनंद लेने के बाद वहाँ से हम सभी लोग रेलवे स्टेशन आ गए | ट्रेन थोड़ा लेट थी लगभग शाम 9:45 पर ट्रेन आई, सभी लोग अपनी-अपनी पूर्व निर्धारित सीट पर जगह ले ली | रात काफी हो गई थी रात्रि भोज के उपरांत सभी सो गए सुबह 8:30 के आसपास हम सभी वापस बेंगलुरु कैंट रेलवे स्टेशन पहुँच गए | वहाँ से हम सब अपने-अपने घर के लिए रवाना हो गए | दक्षिण भारत मुन्नार की यह यात्रा, मेरे लिए एक यादगार यात्रा थी | जैसा कि मैंने सुना था कि, मुन्नार को देवस्थली यानी देवताओं का घर कहा जाता है | वाकई अंत में मुझे लगा कि मुन्नार जैसा स्थान भारत में अन्यत्र मिलना मुश्किल है |

                                                                                 

                                                                              डॉ. प्रो. के के शर्मा 


भाषा की कोई जाति नहीं

 

भाषा की कोई जाति नहीं

   जैसा कि हम सभी लोग जानते हैं कि, संविधान ने हिंदी भाषा को राजभाषा का दर्जा प्रदान किया हुआ है | इस विषय पर केंद्र से इसका कोई भी स्वरूप निश्चित ही नहीं हो पाया है, इसका सिर्फ और सिर्फ कारण यह है कि हिंदी के स्वरूप को समझने में सभी लोग गलती कर जाते हैं | लोगों का यह मानना हो जाता है कि हिंदी तो सिर्फ उत्तर भारत की भाषा है | ऐसा नहीं है और न ही हमें ऐसा समझना चाहिए बल्कि हिंदी तो संपूर्ण देश की समृद्धि भाषा है | जो कि सिर्फ देश के नागरिकों को ही नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व को एक नया मार्ग दिखाने का सामर्थ  रखती हैं | प्रयोग की दृष्टि से अगर हम देखें तो भाषा के दो रूप होते हैं एक तो वह जो हम प्रतिदिन की अपनी दिनचर्या में या कह लीजिए रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल करते हैं | दूसरा वह जो किसी खास प्रयोजन से या खास मकसद से हम लोग प्रयोग करते हैं | हम बात करते हैं पहले वाली भाषा के बारे में जिसे  आदमी अपने परिवेश में सीखता है, अपने परिवार में सीखता है, अपने समाज में सीखता है | और इसके लिए उसको कोई खास प्रयास नहीं करना पड़ता है बल्कि उसके लिए मात्र यह बोलचाल की भाषा होती है | जिसे वह बड़ी सहजता से ही सीख जाता है | इसमें व्याकरण की शुद्धता का विशेष महत्व नहीं होता और न ही इसमें विशेष आग्रह किया गया होता है | इसे हम बोलचाल की भाषा भी कहते हैं | दूसरे प्रकार की भाषा को सीखना पड़ता है, जिसमें एक मर्यादित ढंग का पालन  और व्याकरण के नियम हमें सीखने पड़ते हैं | अर्थात व्याकरण भाषा हमें सीखनी पड़ती है और इसके लिए सीखने में रुचि का होना बहुत ही आवश्यक है |  इसको हम प्रशासकीय भाषा कह सकते हैं जिसकी अपनी एक अलग पहचान होती है | इससे हम सबको सहमत होने की आवश्यकता है और इससे जुड़ना ही पड़ेगा क्योंकि इसका मकसद जीवन यापन से कहीं आगे है | यह निश्चित रूप से इसका असर हमारे साहित्य पर पड़ता है | हम हिंदी भाषा की बात करें तो यह हम सब का कर्तव्य बन जाता है कि हम सब हिंदी साहित्य की, विशेषता: व्याकरण क्षेत्र के लिए हम सभी अध्यापक और शिक्षाविदों का यह कर्तव्य बन जाता है कि हम इन नौनिहालों को एक सही रास्ता दिखाएँ | सही व्याकरण निष्ठ भाषा को सिखाएँ और यहाँ पर मैं कहना चाहूँगा कि भाषा की कोई जाति नहीं होती है | कोई जाति विशेष की भाषा नहीं होती है न ही किसी स्थान विशेष की भाषा होती है | जैसा कि मैंने आपको बताया था कि जो बोलचाल की भाषा होती है उसको हम भाषा न कहकर लोक भाषा कहते हैं | हमारे समाज में बोली जाने वाली भाषा से  हमें ऊपर उठकर सोचना है | हिंदी की कोई जाति नहीं है, यह सभी की भाषा है | इसका कोई वर्ग नहीं है, यह सभी वर्ग की भाषा है | अगर हम कहें संपूर्ण देश की भाषा है और संपूर्ण विश्व को मार्ग दिखाने वाली भाषा है तो यह कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी |

यदि हम आज देखें खास करके इस कोरोना काल में, तो हिंदी भाषा ने आज ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के ऊपर अपने आप को विकास के अवसर में बदल लिया है | हर जगह-जगह वेबिनार आयोजित किए जा रहे हैं | आज हिंदी को लेकर लोग काफी संजीदा हैं | निश्चित तौर पर यह जो समय है कहीं न कहीं मानव समाज के लिए तो एक चुनौती ही है | लेकिन उस चुनौती को अगर हम अवसर में बदलना चाहे तो हम देखते हैं कि, हिंदी भाषा को बढ़ाने के लिए हमें इससे अच्छा और मौका नहीं मिल सकता है | आज जहां हम एक प्लेटफार्म पर इंटरनेट के माध्यम से खड़े हैं और अनेक विभिन्न वर्गों, समितियों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के माध्यम से हम अनेक विभिन्न विचार गोष्ठियां आयोजित कर रहे हैं | उसमें तरह-तरह के विषय या प्रकरण के ऊपर हम चर्चा कर रहे हैं |  जिस तरीके से शोधार्थी,  अध्यापक तथा अन्य समाजसेवी लोग इससे जुड़ रहे हैं, और अपने विचार रख रहे हैं तथा दूसरों के विचार से अवगत होकर कुछ नया सीख रहे हैं | इससे निश्चित तौर पर मैं कहना चाहूंगा कि इससे हमारी हिंदी भाषा के सम्मान में विकास और वृद्धि हो रही है तथा हिंदी एक विश्वव्यापी भाषा के रूप में उभर कर सामने आ रही हैं | सारी दुनिया में आज हिंदी को  एकता की एक कड़ी के रूप में सम्मानित दर्जा प्राप्त हो रहा है | विश्व के अनेक देशों में हिंदी को सम्मान जनक भाषा के रूप में स्थान मिल रहा है | इस गरिमा पूर्ण अवसर के लिए बहार बसे भारतीय मूल के शिक्षाविदों और भारतीयों का सबसे बड़ा हाथ है |

उत्तर भारत की भाषा कह कर के हिंदी के राष्ट्रीय व्यक्तित्व को छोटा करना उचित नहीं है | यह सच है और इसे कोई नकार नहीं सकता कि, आज आहिंदी भाषी क्षेत्र के लोगों ने हिंदी को अपनाया है और उसी के कारण ही हिंदी ने यह स्थान प्राप्त किया है | आज मैं कहना चाहूंगा कि आहिंदी भाषी क्षेत्रों में जितना हिंदी का व्यापक रूप देखने को मिल रहा है, आज तक कभी देखने को नहीं मिला है |  इस कोरोना काल  में अगर हम देखें तो आहिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी को बहुत बड़ा सम्मान मिल रहा है | लोग बहुत कुछ सीखने के लिए तत्पर हैं और सीख रहे हैं |

हिंदी हिंदुओं की भाषा है और उर्दू मुसलमानों की जुबान है ऐसा कहकर भी हिंदी को बहुत आघात पहुँचाया गया है | यह अंग्रेजो तथा मुट्ठी भर अंग्रेजी परस्त लोगों की साजिश रही है | इस बारे में मैं कहना चाहूँगा कि ऐसा नहीं है कि हिंदी सिर्फ हिंदुओं की भाषा है, जी नहीं ऐसा कहना बिल्कुल सरासर गलत बात होगी | भाषा की कोई जाति, भाषा की बिरादरी नहीं होती है | खास करके उसे मजहब का रंग देना तो भारत की संस्कृति के साथ खिलवाड़ करना होगा या संस्कृति के साथ दगाबाजी करना होगा | जो लोग ऐसा कहते हैं मजहब के रंगीन चश्में से इसको देखते हैं वे सरासर देश के साथ और देश की संस्कृति के साथ अन्याय कर रहे होते हैं | एक बार फिर मैं कहना चाहूँगा कि भाषा की कोई जाति या बिरादरी नहीं होती है | भाषा को जीवंत बनाए रखने के लिए कहीं के भी शब्द को आने की इजाजत होनी चाहिए, यह मेरा अपना विचार है | शब्द अन्य भाषा  या फिर ग्रामीण लोक भाषा के भी हो सकते हैं | ऐसे में यहाँ पर हम सबका दायित्व बनता है कि हम उन्हें मार्गदर्शन दें न कि उन पर पाबंदी लगाई जाए | इस बात को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए की भाषा किसी प्रदेश विशेष की अमानत है | आँचलिक बोलियों को मातृभाषा का बड़प्पन दे करके हिंदी की स्थिति को कम करना है, जो कि ठीक नहीं है | मैं तो कहूँगा कि सहज और सरल स्वरूप अख्तियार करने का रास्ता खोजें तो बहुत अच्छी शुरुआत होगी | यदि मैं आहिंदी भाषी क्षेत्र दक्षिण भारत की बात करूँ  तो वहां पर लोग हिंदी भाषा को हृदय से अपना रहे हैं | इसे सीखने में दिन रात एक कर रहे हैं | मैंने अपनी आंखों से देखा है | मैं दक्षिण भारत में अध्यापन का कार्य करता हूँ, और मैंने बच्चों को देखा है इतनी सहजता के साथ हिंदी भाषा को सिर्फ सीखना पसंद ही नहीं करते हैं, बल्कि इसे दिन-प्रतिदिन की दिनचर्या में भी प्रयोग करते हैं | और यह हम सभी के लिए एक बहुत ही अच्छा संकेत है | मेरी राय में भाषा न तो सरल होती हैं और न ही कठिन होती है, इसकी अवधारणा है कि हम इसको कैसे समझते  हैं | हिंदी की कठिनाई का ढिंढोरा पीटने वाले लोग निश्चित तौर पर अपनी समझ की भाषा से ज्यादा प्यार करते हैं | यह मेरा अपना मानना है जैसा उर्दू के माहिर लोग हिंदी जुबान को मुश्किल भाषा कहते हैं और इसमें कठिनाई को दूर करने की बात करते हैं जबकि ऐसा नहीं है | फिर मैं कहना चाहूँगा कि कोई भी भाषा न सरल है और न कठिन, बस जरूरत है तो उसको समझने की | यदि हम बात करें हिंदी और अंग्रेजी की तो अंग्रेजी भाषा से निश्चित तौर पर हिंदी बहुत ही सरल और वैज्ञानिक भाषा है, इसमें अर्थ ह्रदय स्पर्शी होते हैं |

हिंदी को अपना रहे वर्तमान शासन तंत्र में अपनी एक नई पहचान बनाने के लिए हिंदी आगे उभर कर आ रही है और निश्चित तौर पर मैं कहना चाहूँगा कि वर्तमान शासन तंत्र में हिंदी अपनी एक नई पहचान बनाने में कामयाब हो रही है | आने वाले समय में कार्यालय में पत्राचार की भाषा के रूप में निश्चित तौर पर हिंदी लोकप्रिय होगी जिन्हें हिंदी के विकास प्रसार एवं प्रचार का ज्ञान नहीं है | वही हिंदी को सरलीकरण की बात करते हैं, और वह सिर्फ आदत से मजबूर हैं | यह सरकारी कार्यालयों में राजभाषा विभाग की कार्यप्रणाली पर कोई अगर ध्यान दें तो ऐसी बात नहीं मिलेगी हिंदी अब किसी कानून और कायदे की उँगली पकड़कर चलने की भाषा नहीं रह गई है, उँगली पकड़कर चलने की मोहताज नहीं रही है | धीरे-धीरे राष्ट्रीय चेतना उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक संपूर्ण भारत में व्याप्त हो रही है अगर हम कहें तो इस काल में सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर सम्पूर्ण विश्व में हिंदी ने अपना जो स्थान बनाया है पिछले 40 से 50 वर्षों में स्थान हिंदी को नहीं मिल सका है | निश्चित तौर पर मैं कहना चाहूँगा कि लोगों का मन बदल रहा है, विदेशी चीजों के चलते लोगों में जो विदेशी भाषा की ललक थी वह कम हो रही है और वहीं पर वह लोग हिंदी को ज्यादा सम्मान दे रहे हैं | बजाय इसके कहने को कि, हिंदी को सरल किया जाए वह हिंदी को अपना रहे हैं और निश्चित तौर पर हिंदी आगे विकास के क्षेत्र में सभी के लिए एक नया मार्ग खोलेगी और जिससे सिर्फ देश का ही नहीं बल्कि विश्व का कल्याण होगा | यही हमारी संस्कृति कहती है “सर्वे भवंतु सुखिन: सर्वे संतु निरामया” संपूर्ण मानव समाज का कल्याण हो संपूर्ण धरती पर रहने वाले लोगों का कल्याण हो यह हमारी सोच है | निश्चित तौर पर यह जो हमारी राजभाषा है इन सभी चीजों को आगे लाने में सक्षम होगी | आखिर में ढ़ेर सारी शुभकामनाओं के साथ एक बार फिर मैं आप सब को यह बताना चाहता हूँ कि भाषा निश्चित तौर पर लोक भाषा हो सकती है, ग्रामीण भाषा हो सकती है, बोल चाल की भाषा हो सकती हैं, लेकिन भाषा की कोई जाति नहीं होती है | भाषा की कोई बिरादरी नहीं होती है | भाषा तो सिर्फ और सिर्फ भाषा होती है, जो कि हमें अपने विचार को अगले किसी दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाने का एक साधन होती है | मैं आप सब को यह करता हूँ कि आप अपने मन और मस्तिष्क में यह रख लें कि कोई भी भाषा क्यों न हो, भाषा सिर्फ और सिर्फ भाषा होती है |

धन्यवाद |

डॉ. प्रो. के. के. शर्मा

     

शनिवार, 16 नवंबर 2024

पुरानी पेंशन : बुढ़ापे की लाठी

                                                         पुरानी पेंशन : बुढ़ापे की लाठी


पुरानी पेंशन योजना (OPS) को भारत में लंबे समय तक सेवानिवृत्त कर्मचारियों की वित्तीय सुरक्षा का आधार माना जाता रहा है। इसे अक्सर "बुढ़ापे की लाठी" कहा जाता है, क्योंकि यह सेवानिवृत्ति के बाद एक सुनिश्चित और स्थिर आय प्रदान करती थी। इसके माध्यम से न केवल कर्मचारी का बल्कि उसके परिवार का भी भविष्य सुरक्षित हो जाता था। पुरानी पेंशन योजना के सकारात्मक पहलुओं पर चर्चा करेंगे, यह कैसे बुजुर्गों के जीवन में स्थिरता और सुरक्षा लाने में सहायक है और इसे क्यों एक आदर्श पेंशन योजना माना जाता है ।

1. वित्तीय सुरक्षा और आत्मनिर्भरता

पुरानी पेंशन योजना का सबसे बड़ा लाभ यह था कि यह सेवानिवृत्त कर्मचारियों को एक निश्चित आय की गारंटी देती थी। एक निश्चित पेंशन राशि मिलने से व्यक्ति को अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में आर्थिक चिंताओं से मुक्ति मिलती थी। पेंशन योजना के अंतर्गत महंगाई भत्ता (डीए) भी शामिल था, जिससे बढ़ती महंगाई के बावजूद पेंशनधारक अपनी जीवनशैली को बनाए रख सकता था। यह बुजुर्गों को आत्मनिर्भर बनाता था और उन्हें अपने परिवार पर आर्थिक बोझ नहीं बनने देता था।

2. जीवनभर की स्थिरता

OPS के तहत सेवानिवृत्ति के बाद कर्मचारियों को अंतिम वेतन का 50% या उससे अधिक पेंशन के रूप में मिलता था। यह राशि जीवनभर मिलती रहती थी, जिससे बुढ़ापे में आर्थिक अनिश्चितता नहीं रहती थी। इसके साथ ही, पेंशन में महंगाई के अनुसार हर साल वृद्धि होती थी, जिससे व्यक्ति अपनी जरूरतों और स्वास्थ्य से जुड़े खर्चों को आसानी से पूरा कर सकता था। यह स्थिरता वृद्धावस्था में शारीरिक और मानसिक शांति प्रदान करती थी।

3. परिवार के लिए सुरक्षा

पुरानी पेंशन योजना न केवल पेंशनधारक को बल्कि उसके परिवार को भी सुरक्षा प्रदान करती थी। यदि किसी कर्मचारी की मृत्यु हो जाती थी, तो उनके आश्रितों को पेंशन मिलती थी, जिससे उनके परिवार का जीवनयापन सुचारू रूप से चलता रहता था। इस प्रकार, यह योजना परिवार के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच का काम करती थी, जो कि नई पेंशन योजना (NPS) में कमी है।

4. महंगाई से सुरक्षा

पुरानी पेंशन योजना में महंगाई भत्ते का प्रावधान था, जिससे पेंशनधारकों को बढ़ती महंगाई के साथ अपनी पेंशन में भी वृद्धि का लाभ मिलता था। इससे बुढ़ापे में जीवन की बढ़ती लागतों को संभालना आसान हो जाता था। एक स्थिर पेंशन के साथ महंगाई से जुड़ी वृद्धि कर्मचारी को वित्तीय संकट से बचाए रखती थी। यह सुविधा NPS में नहीं है, जिससे नए कर्मचारियों को भविष्य में आर्थिक असुरक्षा का सामना करना पड़ सकता है।

5. कर्मचारियों के लिए मनोबल और सुरक्षा की भावना

पुरानी पेंशन योजना न केवल एक वित्तीय उपकरण थी, बल्कि यह कर्मचारियों के मनोबल और आत्मसम्मान को भी बनाए रखने में सहायक थी। सरकारी नौकरी में काम करने वाले कर्मचारी अपनी सेवाओं के बदले एक स्थिर और सम्मानजनक पेंशन की उम्मीद रखते थे। इससे उनके कार्य प्रदर्शन में सुधार होता था और उन्हें यह विश्वास रहता था कि सेवा के बाद उनका भविष्य सुरक्षित रहेगा। यह मानसिक सुरक्षा कर्मचारियों के जीवन में एक सकारात्मक ऊर्जा लाती थी।

6. सरकारी कर्मचारियों की वफादारी और स्थायित्व

पुरानी पेंशन योजना के कारण कई सरकारी कर्मचारी अपने करियर को स्थिरता के साथ निभाते थे। यह योजना सरकारी कर्मचारियों को अपने पदों पर बने रहने के लिए प्रोत्साहित करती थी, क्योंकि सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें एक सुरक्षित और सम्मानजनक पेंशन मिलने की गारंटी होती थी। यह प्रणाली कर्मचारियों के बीच वफादारी और स्थायित्व को बढ़ावा देती थी, जिससे सरकारी विभागों की कार्यकुशलता में भी सुधार होता था।

7. वृद्धावस्था में गरिमा के साथ जीवन

पुरानी पेंशन योजना न केवल आर्थिक सुरक्षा देती थी, बल्कि वृद्धावस्था में गरिमा के साथ जीवन जीने की भी सुविधा प्रदान करती थी। पेंशनधारक को यह पता होता था कि उसे हर महीने एक निश्चित आय मिलेगी, जिससे वह अपनी जरूरतों को पूरा कर सकेगा और उसे किसी पर निर्भर नहीं होना पड़ेगा। यह आत्मसम्मान वृद्धावस्था में बहुत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह बुजुर्गों को आत्मनिर्भर और संतुष्ट महसूस कराता है।

8. समाज में संतुलन और सामाजिक न्याय

पुरानी पेंशन योजना सामाजिक न्याय की भावना को भी मजबूत करती थी। यह सरकारी कर्मचारियों को सेवा के बाद जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने और समान अवसर प्रदान करने का एक माध्यम थी। इससे समाज में एक संतुलन बना रहता था, जहां बुजुर्ग कर्मचारियों को उनके जीवनभर की सेवा का प्रतिफल मिलता था। यह उन्हें गरीबी या वित्तीय संघर्ष से बचाने में सहायक थी, जो समाज के कमजोर वर्ग के लिए एक मजबूत सुरक्षा तंत्र का काम करती थी।

निष्कर्ष

पुरानी पेंशन योजना (OPS) वास्तव में बुजुर्ग कर्मचारियों के लिए "बुढ़ापे की लाठी" थी। इसने न केवल उन्हें वित्तीय स्थिरता प्रदान की, बल्कि उनके आत्मसम्मान, मानसिक शांति, और जीवन की गुणवत्ता में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। OPS की गारंटीकृत पेंशन व्यवस्था और महंगाई से जुड़ी सुरक्षा ने इसे आदर्श पेंशन योजना बना दिया था। यह योजना न केवल कर्मचारियों के लिए बल्कि उनके परिवारों और समाज के लिए भी उत्तम थी ।

OPS के बंद होने और नई पेंशन योजना (NPS) के लागू होने के बाद से यह स्पष्ट हो गया है कि पुरानी पेंशन योजना बुजुर्गों के लिए बेहतर विकल्प थी। इसके पुन: लागू होने की मांग को देखते हुए यह जरूरी है कि सरकार इस विषय पर पुनर्विचार करे और कर्मचारियों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए उचित कदम उठाए।

प्रो. डॉ. के के शर्मा 'सुमित'

दुनिया भगवान की

 

दुनिया भगवान की

 

भगवान तुम्हारी दुनिया में, अब लोग सताए जाते हैं।

जो मन के साधू होते हैं, नित दूर भगाए जाते हैं।

जो तन स्वादू होते हैं, आसन ही बिठाए जाते हैं।

भगवान तुम्हारी दुनिया में, अब लोग सताए जाते हैं।

जो मन उजले होते हैं, दूर सभा से कराए जाते हैं

धरम-करम का ढोंग जो करते, नित वही पुजाए जाते है। 

श्रीराम तुम्हारी दुनिया में, अब लोग सताए जाते हैं।

कुत्ते-बिल्ली बन घर की शोभा, नित गले लगाए जाते हैं।

माँ-पिता की सेवा करलें, न अब लोग वे पाए जाते हैं।

'सुमित' ऐसा कलयुग आन पड़ा, सच लोग फँसाए जाते हैं।

भगवान तुम्हारी दुनिया में, अब लोग सताए जाते हैं।


प्रो. डॉ. के के शर्मा 'सुमित'

न भारत जैसा देश :

 

न भारत जैसा देश

 पेरिस, घूमे लंदन धूमें, घूमें कइ‌यों देश

पर कहीं न देखा मैने भारत जैसा देश

संस्कार का गुणी-धनी सुन्दर है परिवेश

खनिज संपदरा का धनी-बनी यह

जाति-धर्म-संप्रदाय हैं मिलते जहाँ अनेक

शीश हिमालय सिरमौर है जिसका

हरदम पाँव पखारे है सागर

पूरब में रवि नित आकर जिसे जगाता

दक्षिण में लहराता है जिसके सागर

प्रकृति निखारे नित-नित ऐसा भारत देश

पेरिस, घूमे लंदन धूमें, घूमें कइ‌यों देश

पर कहीं न देखा मैने भारत जैसा देश

कोयल बैठी आम की डाली दादुर शोर मचाते हैं

बाग-बगीचों में नित मोर आकर नृत्य दिखाते हैं

धरती पर हरियाली फैली खेतों में सरसों है फूली

नित भोर भए ही चिड़ि‌या आकर राग सुनाती है

 गंगा-यमुना धार मिले, ऐसा पावन है यह देश 

कहीं न  दिखता जग में, सुंदर ऐसा परिवेश

पेरिस, घूमे लंदन धूमें, घूमें कइ‌यों देश

पर कहीं न देखा मैने भारत जैसा देश


प्रो. डॉ. के के शर्मा 'सुमित'

फल परिश्रम का (कहानी)

 

फल परिश्रम का

      अमनपुर गाँव में एक किसान का घर था उसके दो बेटे थे दोनों बेटे की शादी हो चुकी थी उन दोनों के बीच में चार नाती और तीन नातिने थी | किसान की पत्नी काफी बूढी हो चली थी | उसने जबरदस्ती करके तीनों नातिनों और बड़े नाती की शादी करा दी | अब घर का खर्च काफी बढ़ गया  था | खेती भी कुछ ठीक से न हो रही थी किसान भी बूढ़ा हो गया था, उसने अपने दोनों बेटों को बुलाकर कहा की बेटा अब गाँव में गुजारा होना आसान नहीं रहा और परिवार भी बढ़ रहा है तुम दोनों शहर क्यों नहीं चले जाते वहां जाकर कुछ नया काम धंधा शुरु करो | बात बेटों की समझ में आ गयी दोनों भाई अगले ही दिन कुछ पैसे और थोड़ा खाने-पीने का सामान लेकर शहर जाने वाली सड़क पर चल दिए काफी दूर चलते-चलते उनको प्यास लगी रास्ते में ही एक कुँए के पास जाकर पानी पिया और थोड़ी देर पास के ही पेड़ के नीचे आराम कर फिर से अपनी राह पकड़ ली | अब वे काफी दूर निकल आये थे वापस जाना संभव न था | आगे जंगल था, वे डरने लगे क्योंकि शाम होने को आ गई थी | जंगल काफी घना एवं बड़ा था | वे सोच ही रहे थे कि उनकी नजर एक बूढ़े आदमी पर पड़ी जो सायद शक्ल से अमीर-व्यापारी लग रहा था क्योंकि उसके साथ दो मोटे-मोटे लोग थे जिनके हाँथों में बांस की लाठी थी, अंदाजा यही लग रहा था कि वे उसके अंग-रक्षक थे | दोनों किसान के लड़कों ने व्यापारी के पास जाकर साथसाथ चलने की मदद मांगी उस व्यक्ति ने पहले तो सोच में पड गया फिर न जाने क्या मन में आया की वह साथ चलने के लिए कह दिया | सभी लोग साथ-साथ बातें करते चलते जा रहे थे धीरे-धीरे जंगल भी घना होता जा रहा था | काफी अन्दर जाने पर एक जगह रस्ते के दूसरे छोर से कुछ लोग आते नजर आये, उनके चेहरे ढंके थे और हांथों में धारदार हथियार थे, देखने से लग रहा था कि वे अच्छे आदमी नही थे | व्यापारी की हालत पतली हो चली थी और उसके अंग-रक्षक भी डरने लग गये थे | लेकिन ऐसा दिखाते हुए सभी लोग आगे बढ़ते जा रहे थे कि जैसे सामने से आने वाले लोगों को देखा ही न हो | समीप आने पर एक हट्टे-कट्टे काले आदमी ने कहा रुको, दिखाओ कि तुम लोगों के पास क्या है ? और अगर अपनी खैरियत चाहते हो तो जो भी तुम्हारे पास है उसे बिना सोचे-समझे निकल कर रख दो इतना कहते हुए उस आदमी ने जमीन पर एक अंगौछा बिछा दिया | इशारा करने लगा,  व्यापारी समझ गया की ये डाकू है और इनसे निपटना आसान नहीं होगा सोचकर व्यापारी काफी डर गया था, उसके अंगरक्षकों ने भी डर के मारे कापते हुए व्यापारी से कहा की हुजूर जो कुछ है इनको दे दो और अपनी जान बचाओ जिन्दा रहे तो आप फिर कमां लेंगे, व्यापारी कहने लगा कि इतनी आसानी से अपना मेहनत से कमाया धन कैसे दे   दे |  तुम लोगों को किस दिन के लिए पाला था इनको सबक सिखाओ | व्यापारी के शब्द सुनकर बड़ी फुर्ती से चारो ओर से डाकुओं ने उनको घेर लिया और व्यापारी के गले पर तलवार लगा दी | व्यापारी को घिरा देखकर उसके अंगरक्षक उसको छोडकर भाग गये | अब डाकुओं के सरदार ने सामने आकार कहा-आखरी बार कह रहा हूँ जो है रख कर चलते बनो बरना सभी मारे जाओगे |” किसान के बेटे व्यापारी की मदद करना चाहते थे लेकिन हथियार बंद डाकुओं से निपटने की तरकीब सोच रहे थे इधर व्यापारी ने भी सारा धन रख देने में ही समझदारी मानी और सारा का सारा धन डाकुओं के हवाले कार दिया, डाकुओं की नजर किसान के बेटों पर पड़ी | एक डाकू गरज कर बोला देखता क्या है तुम दोनों भी अपना सामान रख दो, किसान के बेटों ने सही समय भांपकर अपनी-अपनी पोटली रख दी और एक किनारे खड़े हो गये | चारों डाकू सामान समेटने लगे तभी एक डाकू की नजर किसान के बेटों पर पड़ी उसने देखा की दोनों ने माला पहन रखी है डाकू ने उस माला को भी उतारने को कहा लेकिन किसान के बेटों ने माँ की निसानी बताते हुए मिन्नत की कि, इसको छोड़ दो | दोनों ने इशारे ही इशारे में डाकुओं को सबक सिखाने की ठान ली उसी क्रम में दोनों ने डाकू से माला न लेने की विनती करने लगे लेकिन डाकू मानने को तैयार न थे तभी तेस में आकर एक डाकू ने किसान के बड़े बेटे पर तलवार से वार करना चाहा ठीक उसी समय अवसर का लाभ उठाते हुए किसान के दूसरे बेटे ने बड़ी फुर्ती से अपने अंगोछे को फेंकर उसकी तलवार लपेट ली और उसपर एक जोरदार मुक्के से वार किया डाकू इस प्रकार के वार को झेलने को तैयार न था वह जमीन पर गिर गया | किसान के बड़े बेटे ने अपने आप को सम्हालते हुए डाकुओं पर हमला बोल दिया किसान के छोटे बेटे ने तलवार उठाकर डाकुओं पर टूट पड़ा और दो डाकुओं को मौत के घाट उतार दिया यह देख बाकी बचे डाकू अपने प्राण बचाते हुए भाग निकले | व्यापारी सारी घटना अपनी आँखों से देखता रहा और अंत में किसान के बेटों को अपने साथ अपने घर ले गया तथा उन किसान के बेटों को अपनी पूरी संम्पति देकर एक लम्बी यात्रा पर निकल गया | अब किसान के बेटे ही उसका सारा काम-काज देखने लगे देखते ही देखते व्यापारी का व्यापार कुछ ही दिनों में दुगना फिर तिगुना और फिर कई गुना बढ़ता चला गया व्यापारी यात्रा से वापस आकर दोनों किसान के बेटों को अपने व्यापार में हिस्सेदार बना दिया किसान के बेटों की मेहनत रंग लाई और कुछ ही सालों में व्यापारी पूरे राज्य का नामी सेठ बन गया व्यापारी के कोई संतान न थी सो उसने कुछ धन गरीबों में दान कर दिया और बचा धन किसान के बेटों के नाम कर दिया और अंतिम साँस ले कर दुनिया से बिदा ले ली | किसान के बेटों को उसकी मेहनत का फल मिला | जो लोग दूसरों की मदद बिना किसी लालच के करते है भगवान भी उन्ही की मदद करते है जैसे गरीब किसान के बेटों की मदद कर भगवान ने उनके परिश्रम का फल दिया और उनको एक प्रतिष्ठित व्यापारी बना दिया | यह उनकी अपनी ईमानदारी और मेहनत का फल था |

प्रो. डॉ. के के शर्मा 'सुमित'

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